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शनिवार, 31 अगस्त 2013

बिलौटी (भाग एक)

बिलौटी ठेकेदारिन साइकिल से उतरी। साइकिल स्टैंड पर लगा, सीधे परसाद पान गुमटी पर आइ।  परसाद का गतिषील हाथ क्षण भर का ठिठका। गुमटी के सामने खड़े अन्य लोगों का ध्यान बंटा।
रामभरोसे हिंदू होटल, धरम ढाबा, ममदू नाइ की गुमटी और बस-स्टैंड के आस-पास बिखरे लोग सजग हुए। परसाद ने पान का बीड़ा बिलौटी की तरफ बढ़ाया। बिलौटी पान लेकर बड़ी नफ़ासत से उसे एक गाल के सुपुद किया और खुली हथेली परसाद की तरफ बढ़ा दी। परसाद ने अख़बार के टुकड़े पर सादी पत्ती, तीन सौ चौंसठ, चमन बहार और सुपारी के चंद क़तरे रखकर बिलौटी की तरफ पेष किया। पान की एक टूटी डंडी में चूना चिपका कर आगे बढ़ाया। बिलौटी ने बड़े इत्मीनान से तंबाकू-ज़दा फांक कर चूना चाटते हुए एक रूपए का सिक्का गुमटी में बिछे लाल कपड़े पर उछाला। फिर सधे क़दमों से साइकिल की तरफ़ बढ़ गइ।
बिलौटी के पैरों में जूता-मोजा था। सलीके से बंधी लाल-गुलाबी साड़ी में उसकी गेंहुआ रंगत खिल रही थी। साड़ी और ब्लाउज़ के बीच से झांकता उसका पेट और पीठ का हिस्से पर लोगों की आंखें चिपक गइ थीं। साइकिल के कैरियर में एक रजिस्टर और एक डायरी फंसी थी। उसकी भूरी आंखों के जादू और मद-मार अदाओं से बस-स्टैंड का वातावरण प्रतिदिन इसी तरह मंत्र-बिद्ध होता है।
महाप्रबंधकर कायालय की तरफ जाने वाली मुख्य सड़क पर जब वह साइकिल का पैडल मारती सर से चली गइ, तो तमाषबीन बिलौटी के सम्मोहनी प्रभाव से आज़ाद हुए। सहज हुए लोग, सहज हुए दुकानदार, सहज हुए खरीददार, सहज हुए यात्रीगण और सहज हुए बिलौटी के भूत, भविष्य और वतमान जानने का दावा ठोंकने वाले जानकार! 
यहां तक कि उसके व्यक्तित्व से अंजान लोगों के दिलो-दिमाग में काफी देर तक सनसनाती रही बिलौटी...
कितना भी बखान किया जाए, बिलौटी के विलक्षण व्यक्तित्व का समग्र वणन किसी एक की जु़बान से होना असम्भव है। हर बार कुछ नया जुड़ जाता, कुछ पुराना छूट जाता। नए लोग, पुरानों से खोदा-खादी करते-’’कौन है रे बप्पा, कौन है इ आफ़त!’’
पुराने टुकड़ों में बताते बिलौटी-पुराण....
कइ टुकड़ों-चीथड़ों को इकट्ठा कर गुदड़ी बनाने का सब्र इस दौर के श्रोताओं में अब कहां दिखता है? वह भी ऐसे समय में, जब टीवी, सिनेमा वाले किस्सा-कहानियों को नज़रअंदाज़ कर मनोरंजन परोस रहे हैं। नतीजतन बिलौटी एक अबूझ पहेली बनी रहती। जब भी वह मदों के संसार में प्रवेष करती, अनगिनत प्रष्नों, जिज्ञासाओं, दंतकथाओं के बीज छींट कर फुर हो जाती।
कौन जानता था कि पगलिया ससुरी की बउड़ही बिटिया बिलौटी बड़ी होकर इतनी तेज-तरार निकल जाएगी। कोयले की झौड़ी (टोकरी) सिर पर ढोते-ढोते इतनी तरक्की कर जाएगी कि एक दिन ‘लेबर-सप्लायर’ बन जाएगी।
‘ठीकेदारिन कहते हैं उसे मज़दूर-रेज़ा, नेता-परेता।
ठाठ तो देखिए....ठाड़े-ठाड़े गरियाती है लेबरों, अफसरों और मउगे नेताओं को। 
नेता, अफसर, ठेकेदारों के बीच उठती-बैठती और क्या जाने दारू-मुगा भी खींचती है।
ओंठकटवा तिवारी राज़दाराना अंदाज़ में बताता-’’रे बप्पा, खटिया में खुद ‘मरद’ बन जावै है छिनाल! अच्छे-अच्छे पहलवानों की हवा निकाल देवे है। एही कारन तुलसी बाबा आगाह कर दिए हैं कि ढोर, गंवार, सूद्र, पसु-नारी, इ सब ताड़न के अधिकारी। इन सबसे बच सकौ तो बच के रहौ। लेकिन ओही मूड़ै मां चढ़ाए हैं ससुरे ठीकेदार, मुंषी और कोलियरी के अधिकारी। तब काहे न छानी पे चढ़के मूते इ बिलौटिया....जानत हौ भइया, एक गो बिटिया है ओखर, का जाने ‘सुरसत्त्ती’ कि का नाम रखिस है। ‘सुरसत्ती’ ससुरी अंगरेजी स्कूल में पढ़े जावै है।’’

·         
लोग तो बस याद करते हैं पगलिया को। बिलौटी की मां पगलिया।
पगलिया की बेषुमार गालियां बस-स्टेंड पर अनवर गूंजा करतीं। वह हवा में गालियां बका करती। स्टैंड के पास बने पोस्ट-आफिस के लाल-डब्बे में लोग चिट्ठियां डालने आते तो उसकी गालियों का षिकार बन जाते। पगलिया को भरम रहता कि चिट््ठी डालने के बहाने लोग उसको और उसकी बिटिया बिलौटी को ताकते हैं। इसीलिए वह अंधा-धुंध गालिया बकती। लोग हंसते। बिलौटी ठीकेदारिन, “ाक्तिनगर-वाराणसी हाइवे के किनारे बस-स्टेंड के ‘टिन-षेड’ पर साधिकार कब्ज़ा जमाकर गुजर-बसर करने वाली पगलिया की कोख-जाइ थी। गरीबी, अभाव, बदकिस्मती और ज़माने की बेरहम ठोकरें खा-खाकर पगलिया का जिस्म जजर हो गया था। उसकी रंगत झुलस चुकी थी। कहते हैं कि पगलिया जब आइ थी ठीक-ठाक दिखाइ देती थी। ओंठकटवा तिवारी ठीकै कहता-’’अरे भइया, जवानी में तो गदहिया भी सुंदर दिखाइ देवै है।’’
यह तो अच्छा ही हुआ कि पगलिया को बिलौटी के बाद और बच्चे न हुए। बिलौटी का जन्म भी साधारण परिस्थितियों में नहीं हुआ था। तब पगलिया का डेरा बस-स्टेंड का टिन-षेड नहीं हुआ करता था।
चौदह-पंद्रह बरस पहले यहां पर कहां कुछ था।
उत्तर-प्रदेष के मिज़ापुर ज़िले का आखिरी कोना। जहां कोयले की खदान खुलने वाली थी। वाराण्सी से रेनूसागर बिजली कारखाने तक काम-चलाऊ सड़क बन रही थी। तब “ाक्तिनगर आने के लिए सिंगरौली से रास्ता था या फिर औडी मोड़ से पहाड़ी की की जड़ पकड़ कर पैदल चलने से परासी, बीना, खड़िया, कोटा पहुंचा जाता था।
कहते हैं वाराणसी से रेनूसागर तक पगलिया बस से आइ थी।  बस-स्टैंड पर बस खाली हो जाती।
उस दिन सब सवारियां उतर गइं और पगलिया न उतरी तो कंडक्टर उसके पास गया।
कंडक्टर को उस पर पहले से ही “ाक था।  किराया न अदा की होती तो वह उसे लाता भी नहीं। पगलिया पिछली सीट पर सिकुड़ी-सिमटी बैठी हुइ थी। गठरी थी एक उसके पास, जिसे बड़े जतन से गोद में रखे हुए थी। कंडक्टर कइ तरह की नैतिक-अनैतिक सम्भावनाओं की कल्पना करता उसकी बगल में जा बैठा। बस में और कोइ न था। चालक अपना झोला-सामान लेकर जा चुका था। रात के ग्यारह बज रहे थे। सवारियां अपने गंतव्य तक पहुंचने की हड़बड़ी में थीं। बस-स्टैंड के पष्चिम में एक ढाबा था। ढाबे का मालिक जीवन इस बस का इंतज़ार करके दुकान बढ़ाता था। ठंड अपना असर जमा चुकी थी। जीवन भट्टी की आग ताप रहा था। कंडक्टर और जीवन का पुराना याराना था। कंडक्टर अक्सर बनारस से अद्धा-पउवा ले आया करता और गमागम पराठे, आमलेट और बैगन-आलू के भरते के साथ दोनों साथ-साथ खाना खाते। जीवन सोच रहा था कि कंडक्टर “ाायद दिसा-मैदान गया होगा।
लेकिन कंडक्टर के सामने तो एक दूसरी थाली परोसी हुइ थी। माले-मुफ्त, दिले-बेरहम... वह अकेले ही उस भोजन का स्वाद चखना चाहता था।
पगलिया की देह से अजीब दुगंध फूट रही थी।
बस की नौकरी, अधजले इंधन की गंध, सिगरेट-बीड़ी-अगरबत्ती की मिली-जुली गंध और दिन भर की थकान से वह परेषान था किन्तु पगलिया की बीस-बाइस साल की युवा देह की दुगंध में एक और आदिम गंध “ाामिल थी।
कंडक्टर तड़प उठा। पूछा तो पगली मुस्कुराइ। कुछ न बोली। नाम-गांव, रेनूसागर में किसी सगे-सम्बंधी या अन्य कोइ भी जानकारी न देकर वह बस इत्ती सी मुस्कुरा देती। कंडक्टर उसका हाथ पकड़कर उतारने का उपक्रम करने लगा। दुगंधयुक्त देह की मादक गमाहट से वह बौखला सा गया। उसकी बगल में बैठ चुपचाप उसे बांहों में घेर लेना चाहा। पगलिया आंखें झपका कर कुनमुनाइ। उसमें इंकार की आहट थी न इकरार की।
बस के अंदर चांदनी रात के चांदीनुमा टुकड़े, खिड़की के रास्ते बिखरे पड़े थे। ऐसा ही एक मद्धम-दमकता सा टुकड़ा पगली के चेहरे पर कुदरती गहने के रूप में आ सजा था। पगली की देह-गंध या तो गायब हो गइ थी, या फिर कंडक्टर के कोषिषों को वह सहजता स्वीकार कर रही थी। कंडक्टर इस अद्भुत यथाथ को इष्वर का दिया वरदान समझकर प्रसाद स्वरूप ग्रहण करना चाह रहा था। कंडक्टर अधीर होकर उसकी देह का रसपान करने लगा। अचानक उसे लगा कि पगलिया कुछ बोली है। कंडक्टर चैतन्य हुआ। वह भूखी थी। कंडक्टर ने सोचा भगवान का प्रसाद है, बांट कर खाया जाए तो और अच्छा।
कंडक्टर अलग हटा तो पगली खुष दिखाइ दी। कंडक्टर की जांघ में चिकोटी काट कर हंसी। कंडक्टर पगली के इस खुषी ज़ाहिर करने के तरीके पर सौ जान कु़रबान हुआ। उसकी छातियां नापता वह नीचे उतर गया।
जीवन, ढाबे का मालिक, बिहार के सिवान जिले का निवासी था और इस बियाबान में बिना परिवार के रहता था। उसने जब कंडक्टर की बात सुनी तो वह काफी खुष हुआ। तय हुआ कि पगलिया के संग बस के अंदर ही ‘जुगाड-फिट’ किया जाए। उधर पता नहीं पगली को क्या सूझी कि दबे पांव, पोटली कांख में दबाए बस से उतरी और बस के पीछे अंधियारे का लाभ उठाकर उस सड़क पर चल दी, जिसके बारे में वह नितांत अनभिज्ञ थी। उसे नहीं मालूम था कि सड़क कहां जाती है? सड़क वैसे भी कहीं आती-जाती नहीं, जाते तो मुसाफिर ही हैं, किन्तु उसे यह भी तो मालूम न था कि स्वयं उसे कहां जाना है।
आधी रात!
वह भी जाड़े के “ाुरूआती  दौर की रात!
औड़ी मोड़ का यह इलाका अन्य जगहों से कुछ ज्यादा ही ठंडाता है।
पगली अकबकाइ सी रेनूसागर की रोषनियों के विपरीत दिषा में चल दी। सामने भी रोषनियों के टुकड़े छितराए थे। महुआ, पलाष और आम के वृक्षों के बीच से छन कर आने वाली चांदनी की फुहारें रास्ता दिखातीं। पगली के लिए उजाला भी तो उतना ही निरथक था जितना कि अंधेरा।
चांद अपना सफर तय करता रहा और रेनूसागर से दक्षिण दिखा की तरफ पगलिया का सफ़र भी ज़ारी रहा।  कोयला खदानें अभी नइ-नइ खुली थीं उनके कामगारों के लिए स्थाइ-अस्थाइ निवास बने हुए थे। वह एक ऐसी बस्ती में जा पहुंची जिसे खदानी लोग ‘कालोनी’ कहते थे। महुआ का एक बड़ा सा पेड़ देख वह उसके तने से टिक कर बैठ गइ।

महुआ के पेड़ के ठीक सामने सिन्हा बाबू का क्वाटर हुआ करता था। नइ कालोनी अभी व्यस्थित नहीं हुइ थी। ‘ले-आउट’ के अनुसार ठेकेदार धड़ाधड़ ‘फिनिषिंग-टच’ देने का प्रयास कर रहे थे। माचिस की डिबियानुमा क्वाटरों में कमचारी अपना संसार गढ़ने में व्यस्त थे। पगली महुआ के पेड़ की पुष्त पर टिकी थी। वह भूख के एहसास को थकावट से पराजित करने का प्रयत्न करती सोने का उपक्रम करने लगी। ठंड अब बढ़ गइ थी।

शनिवार, 22 जून 2013

मेकिंग ऑफ पहचान

वैसे तो मैं कविता कहानियाँ लगातार लिख रहा था. हंस में तीन कहानियां आ चुकी थीं. अब मैं अपने लेखन से संतुष्ट था. क्योंकि कानपुर से निकलने वाली लघुपत्रिका के संपादक स्व. सुनील कोशिश ने जब मेरी पहली कहानी स्वीकृत की थी तब कहा था की हंस में छापना कथा-कार की कसौटी है. आपको हंस पढ़ना और कहानी के नए ट्रेंड को पकड़ना होगा.  उनकी सीख ने असर किया था. अब ऐसे संपादक कहाँ जो बनते हुए लेखक को खाद-पानी दें.
तो मैं बता रहा था की कहानियां छापने लगीं. अकार, अन्यथा, कथाबिम्ब, कथादेश में कहानियां आ चुकीं. 
मैं खुद को बचपन से एक उपन्यासकार के रूप में स्थापित होते देखना चाहता था.
मेरे पास सिंगरौली की सर-ज़मीन पर उपन्यास का खाका तैयार हो चूका था.
ज़रूरत थी सिर्फ एक बार तबीयत से पत्थर उछलने की….
मैंने अपने मन में उपन्यासकार बनने की तड़प को महसूस किया…..
मेरा इरादा लंबे उपन्यास लिखने का नहीं था.
लघु-उपन्यास या उपन्यासिका ही मेरा टारगेट था.
ऐसा काम्पेक्ट कथानक की पाठक एक बार घुसे तो फिर पूरा पढ़ कर ही रीते….
जैसा की दोस्तोयेव्स्की के उपन्यासों में होता है…
जैसा की निर्मल वर्मा के उपन्यासों में होता है…
जैसा की अमृता प्रीतम के उपन्यासों में होता है…
जैसा की कृष्ण सोबती के उपन्यासों में होता है…
ऐसा तो था मेरा स्वप्न…और उसके लिए मुझे बड़ी कड़ाई से अपने लिखे को काटना भी था….
जब मैं सिंगरौली की कोयला खदानों में काम करता था, तभी ‘पहचान’ का आइडिया मन में आया था. ये बात सन १९९० की है.
तब तक मैं कवी से कथाकार बन चूका था. कथानक, हंस, कथाबिम्ब, अक्षरपर्व में कहानियां पब्लिश हो चुकी थीं. इरादा था की अब उपन्यास में हाथ साफ़ किया जाए.
मैंने एक रजिस्टर लिया और उसके पहले पन्ने पर उपन्यास का खाका खींचा.
मुझे मंटो याद हो आये और मैंने रजिस्टर में कलम चलाने से पहले ‘७८६’ लिखा.
जैसा की मंटो करते थे.
उपन्यास का मैंने शीर्षक सोचा और बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा
—–छलांग—-
इसमें युनुस की कहानी शुरू हुई.
फिर काम रुक गया.
विभागीय परीक्षाएं आती रहीं और कविता कहानियां समय खाती रही.
फिर १९९३ में मेरी शादी हो गई.
१९९४ में  फिर मैं रजिस्टर के पन्ने उलटने पलटने लगा.
युनुस के साथ अब सलीम का चरित्र खुला.
युनुस के खाला खालू आये और उपन्यास ४० पन्ने का हो गया.
फिर मैं भूमिगत कोयला खदान में प्रशिक्षण के लिए आ गया. डेढ़ साल उसमे लगे.
रजिस्टर के पन्नों में कैद युनुस भी गुप-चुप ढंग से आकार लेता रहा.

सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

देशभक्ति

लघुकथाएँ - देश - अनवर सुहैल
देशभक्ति
भइया जी का ऐलान, ‘‘खाते यहाँ की, और गाते पाकिस्तान की...इन्हें पाकिस्तान खदेड़ देना चाहिए!’’
मैंने एतराज किया, ‘‘और ये जो इतने सारे मुसलमान कन्धे से कन्धा मिलाकर देश की उन्नति में जुटे हैं...उनके बारे में कुछ सोचा है?’’
‘‘मैं उनकी बात नहीं करता, किन्तु अधिकतर मुस्लिम पाकिस्तानपरस्त है, समझे....आई एस आई के एजेन्ट सब!’’
‘‘अच्छा तो भइया जी, ये तो बताइए कि देशभक्त मुसलमान कौन है?’’
‘‘काहे....शहीद अशफाक, कैप्टन हमीद, और कारगिल के शहीद कैप्टन हनीफ आदि भारतीय देशभक्त है ही....’’भइया जी ने सगर्व कहा।
मुझसे रहा न गया, ‘‘वाह भइया जी वाह! इसका मतलब ये कि देशभक्ति का सबूत देने के लिए तमाम भारतीय मुसलमानों को मरना होगा क्या?’’
भइया जी जवाब कहाँ सुनते हैं....वह तो बस ऐलान करते हैं!
शेष, 2001
लघुकथाएँ - देश - अनवर सुहैल
देशभक्ति
भइया जी का ऐलान, ‘‘खाते यहाँ की, और गाते पाकिस्तान की...इन्हें पाकिस्तान खदेड़ देना चाहिए!’’
मैंने एतराज किया, ‘‘और ये जो इतने सारे मुसलमान कन्धे से कन्धा मिलाकर देश की उन्नति में जुटे हैं...उनके बारे में कुछ सोचा है?’’
‘‘मैं उनकी बात नहीं करता, किन्तु अधिकतर मुस्लिम पाकिस्तानपरस्त है, समझे....आई एस आई के एजेन्ट सब!’’
‘‘अच्छा तो भइया जी, ये तो बताइए कि देशभक्त मुसलमान कौन है?’’
‘‘काहे....शहीद अशफाक, कैप्टन हमीद, और कारगिल के शहीद कैप्टन हनीफ आदि भारतीय देशभक्त है ही....’’भइया जी ने सगर्व कहा।
मुझसे रहा न गया, ‘‘वाह भइया जी वाह! इसका मतलब ये कि देशभक्ति का सबूत देने के लिए तमाम भारतीय मुसलमानों को मरना होगा क्या?’’
भइया जी जवाब कहाँ सुनते हैं....वह तो बस ऐलान करते हैं!
शेष, 2001

लघुकथा./ अनवर सुहैल/
भइया
जी का ऐलान, ‘‘खाते यहाँ की, और गाते पाकिस्तान की...इन्हें पाकिस्तान खदेड़ देना चाहिए!’’मैंने एतराज किया, ‘‘और ये जो इतने सारे मुसलमान कन्धे से कन्धा मिलाकर देश की उन्नति में जुटे हैं...उनके बारे में कुछ सोचा है?’’
‘‘
मैं उनकी बात नहीं करता, किन्तु अधिकतर मुस्लिम पाकिस्तानपरस्त है, समझे....आई एस आई के एजेन्ट सब!’’
‘‘
अच्छा तो भइया जी, ये तो बताइए कि देशभक्त मुसलमान कौन है?’’
‘‘
काहे....शहीद अशफाक, कैप्टन हमीद, और कारगिल के शहीद कैप्टन हनीफ आदि भारतीय देशभक्त है ही....’’भइया जी ने सगर्व कहा।
मुझसे रहा न गया, ‘‘वाह भइया जी वाह! इसका मतलब ये कि देशभक्ति का सबूत देने के लिए तमाम भारतीय मुसलमानों को मरना होगा क्या?’’भइया जी जवाब कहाँ सुनते हैं....वह तो बस ऐलान करते हैं!शेष, 2001

शुक्रवार, 25 जनवरी 2013

खदान का अँधेरा


PAINTING BY K. RAVINDRA
मेरी कविताओं में
नही दीखते उड़ान भरते पंछी
नहीं दीखता शुभ्र-नीला आकाश
नही दीखते चमचमाते नक्षत्र
नही दीखता अथाह विशाल समुद्र
नही दीखता सप्तरंगी इन्द्रधनुष
क्या ऐसा इसलिए है
कि भूमिगत कोयला खदान के अँधेरों में
खो गयी मेरी कल्पना शक्ति
खो गयी मेरी सृजनात्मक दृष्टि
खो गयी मेरी अभिव्यक्ति....!

मंगलवार, 22 जनवरी 2013

आरकुटियन

कहानी:
आरकुटियन
अनवर सुहैल

 
 
साहनी साहब ने आरकुट लागिन किया।
जूसीपुस्सी69 आन-लाईन मिली।
साहनी साहब ने चैटिंग पैड पर टाईप किया-‘‘हैलो बेब’’
तत्काल जवाब मिला-‘‘हाय सैक्सी’’
‘‘आज क्या पहन रखा है?’’
‘‘क्या कुछ पहनना जरूरी है?’’
‘‘ओ, मीन्स?’’
‘‘इट डज़न्ट मैटर!’’
‘‘जस्ट आई वान्ट टू सी यू इन पिंक टाप!’’
‘‘या, आयम इन पिंक टाप’’
अचानक डाटा इनकमिंग में प्राब्लम आई। वार्तालाप में बाधा आई।
साहनी साहब ने टाईप किया-‘‘शिट्’’ और नेटवर्क कनेक्शन चेक करने लगे।
वहां उन्होंने अपना यूज़र आई डी बनाया हुआ है ‘हाटीपाटी007’। इस फर्जी आई डी को सपोर्ट करने के लिए उन्होंने जीमेल पर अपना ईमेल आई डी बनाया हुआ है-‘हाटीपाटी007 एट जीमेल डाट काम। वैसे उनका आफीशियल आई डी दूसरा है। साईबर-संसार की अद्भुत माया है, जहां आदमी अपनी असली आईडेंटिटी छुपा कर किसी भी जाली आई डी और विवरण पर ईमेल एकाउण्ट खोल सकता है। नौजवान लड़के लड़कियों के नाम पर आरकुट जैसी सोशल साईट्स पर करोड़ों रोचक जानकारियां अपलोड हैं। अपनी फोटो की जगह वे किसी बालीवुड की हीरोईन को फोटो चिपका देते हैं या फिर एडल्ट साईट से न्यूड थम्बनेल अपलोड कर देते हैं। नए-नए आरकुट रसिक इन नकली लड़कियों से चेट करते हैं और बातों-बातों में अपनी असलियत बता कर ठगी का शिकार होते हैं। बहुत सारी वेबसाईट्स तो ऐसी हैं जो धीरे- धीरे आपके कांफीडेंशियल डिटेल्स पता कर लेते हैं और आपके बैंक एकाउण्ट तक से छेड़खानी करने लगते हैं। नाईजीरियन युवा तो जाली ईमेल भेज कर लाखों डाॅलर की लाटरी आपके नाम निकाल देते हैं और मौका पाकर उस लाखों डाॅलर पाने के लिए आपसे हजारों रूपए ऐंठ लेते हैं। आए दिन अख़बारों में ऐसे कि़स्से आते ही रहते हैं कि साईबर अपराध के ज़रिए अमुक व्यक्ति इतने हज़ार या इतने लाख की ठगी का शिकार हुआ है।
‘हाटीपाटी007’ वाले एकाउण्ट में साहनी साहब ने अपनी डिटेल्स में उम्र दिखाई है इक्कीस वर्ष। शैक्षणिक जानकारी में उन्होंने डाला हुआ है कि वे मेडिकल की पढ़ाई पढ़ रहे हैं। अपनी फोटो की जगह शाहिद कपूर की फोटो अपलोड की है। बहुत सारी लड़कियां और लड़के उनके फाॅलोअर बन चुके हैं। लड़कियां उन्हें एक टेलेण्टेड युवक जानकर उनपर जान छिड़कती हैं और फालोअर लड़कों में अधिकांश ‘गे’ हैं। वे जिस्मानी ताल्लुकात के लिए चेट करते हैं। कई आरकुटियन तो अपनी साईट्स पर एडल्ट सामग्री अपलोड किये हुए हैं। कुल मिलाकर आरकुट एक चटपटी सोशल वेबसाईट है। इसीलिए साहनी साहब आरकुट को चिरकुट भी कहते हैं। वाकई इस सोशल-साईट पर अधिकतर चिरकुट ही आते हैं।
साहनी साहब फुरसत के क्षणों में इंटरनेट चलाते हैं। पहले तो उन्होंने शेयर मार्केट की उथल-पुथल को जानने के लिए नेट का सहारा लिया था लेकिन धीरे-धीरे सोशल साईट्स पर भी जाने लगे। खाली समय में पोर्न साईट्स को भी खंगालते हैं साहनी साहब। ऐसा नहीं है कि साहनी साहब के वैवाहिक जीवन में कोई कमी है लेकिन बचपन से उनके अंदर यौन-जिज्ञासा कूट-कूट कर भरी हुई है। वैसे तो वह महिलाओं से बड़ा सौम्य व्यवहार किया करते हैं। उनकी शराफ़त के कि़स्से हर जगह मशहूर हैं लेकिन जाने क्या बात है कि वे एकांत में विचलित हो जाया करते हैं।
साहनी साहब याद करते हैं अपना बचपन कि जब सत्यम् शिवम् सुंदरम रिलीज़ हुई थी तब ज़ीनत अमान के शाॅट्स को लेकर कितना हाय-तौबा मचा था। राजकपूर की उस कलात्मक फिल्म को एक तरह से वयस्क फिल्म का दर्जा मिला हुआ था। राजकपूर ने स्त्री शरीर और मन को अलगियाया था। जिसमें स्त्री के मन की सुंदरता का बखान किया गया था, लेकिन संसार तो स्त्री देह की सुंदरता को पसंद करता है। वर्जनाओं के चलते, साहनी साहब ने उस समय वह फिल्म नहीं देख पाए थे। यहां तक कि ‘ बाबी’, राम तेरी गंगा मैली जैसी पिक्चरें भी वह उस समय नहीं देख पाए थे। बाद में जब उन्होंने इन पिक्चरों के देखा तो लगा कि इमरान हाशमी और मल्लिका शेरावत यदि उस समय फिल्मों में आते तो भूखे मर जाते। अमूमन पारिवारिक माहौल की कहानियां हुआ करती थीं तब, जिनमें हीरोईन अपने जिस्म की नुमाईश नहीं करती थीं। यहां तक कि फिल्मी गाने भी द्विअर्थी नहीं हुआ करते थे। फिल्म ‘विधाता’ में जब ‘सात सहेलियां खड़ी-खड़ी’ गाना आया तो उस पर बड़ा वबाल मचा था।
फिर जब ‘चोली के पीछे क्या है’ गाना आया तो बाका़यदा उस पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस-मुबाहसे हुए थे। जब देश में कलर टेलीविज़न और वी सी आर आया तब जाकर विदेशी नीली फि़ल्में एक ख़ास तबके तक पहुंचीं। टेक्नोलाजी के एडवांस होते-होते नीली फिल्में अब तो मोबाईल के सेट पर उपलब्ध हो रही हैं। थ्री-जी के मोबाईल सेट नौजवानों मं इसीलिए तो लोकप्रिय हो रहे हैं। अब तो सुनते हैं कि फोर-जी टेक्नोलाजी वाले सेट विदेशों में आने लगे हैं। खुदा ख़ैर करे...!
साहनी साहब ने अपनी नौकरी के शुरूआती दौर को याद किया। तब उनकी पोस्टिंग शहडोल में हुई थी। वह सिंचाई विभाग में सब-इंजीनियर थे। काम का दबाव न था। शादी के लिए देखा-देखी चल रही थी। उनका परम-मित्र था मनोज अग्रवाल जो कि एक ठेकेदार था। मनोज अपनी मारूति में लादकर, उनके आवास पर कलर-टीवी और वीसीपी लाता था। साहनी साहब अमिताभ बच्चन के बड़े फैन थे। मनोज अग्रवाल ने उन्हें अमिताभ बच्चन की कई मूवी दिखाई थीं। ‘दीवार’ और ‘सिलसिला’ उनकी पसंदीदा पिक्चरें थीं। अमिताभ की पिक्चर देखने के बाद वे लोग नीली फि़ल्में देखा करते थे। वीसीपी में एक ख़ासियत थी कि कभी कभी उसका टेप फंस जाता था। कभी पिक्चर-क्वालिटी ख़राब आती थी।
काम के सिलसिले में साहनी साहब जब भी भोपाल जाते तो वहां खाली समय में ‘केवल वयस्कों के लिए’ वाली पिक्चर देखा करते थे। माना कि ऐसी फि़ल्मों वाले सिनेमा हाल खटमल और गंदगी का पर्याय हुआ करते थे। लेकिन क्या करें वो। भोपाल के अच्छे सिनेमाघर तो ऐसी फि़ल्में लगाने से रहे। साहनी साहब क्या करते, स्टेटस देखें या दिल की सुनें।
शादी हुई और सरला के रूप में खूबसूरत पत्नी मिली। दहेज में अन्य सामानों के साथ मिला कलर टीवी और एक अदद वीसीडी प्लेयर। उनकी धर्मपत्नी सरला अपने नाम के अनुसार सात्विक और साधु स्वभाव की निकलीं। जब एक दिन उन्होंने वो वाली वीसीडी सरला को दिखलाई तो वह नाराज़ हो गईं। सरला नहीं जानती थी कि शरीर के गोपन रहस्यों की मर्यादा को किस तरह से संसार में देखा-दिखलाया जा रहा है। उसका सनातन मन और दिमाग किसी तरह से साहनी साहब से तारतम्य नहीं बिठा पा रहा था। सरला ने साहनी साहब की खूब लानत-मलामत की। साहनी साहब ने अपने तईं समझाना चाहा कि जिन्दगी हर समय साफ-सुथरी और सात्विक नहीं रहा करती है। शादी के बाद की जि़न्दगी में तो ये सब होना ही चाहिए। आखिर हमारे ऋषि-मुनियों ने भी काम से हार मानी थी। खजुराहो की मूर्तियां क्या हमारी सांस्कृतिक विरासत नहीं हैं। आचार्य रजनीश भी तो कहा करते हैं कि संभोग से समाधि मिलती है। कितने बड़े-बड़े विद्वान आचार्य रजनीश के शिष्य हैं। पति-पत्नी के बीच हमेशा साफ-सुथरी बातें नहीं होनी चाहिए। कभी-कभी जिन्दगी को ग़लाज़त से लबरेज़ भी होना चाहिए। इससे टेस्ट चेंज होता है और जि़न्दगी के कैनवास में नए रंग भरते हैं।
सरला उनके भोथरे तर्कों से पराजित नहीं हुई।
आत्म-रति के अभ्यस्त साहनी साहब ने फिर ये रास्ता निकाला कि जब सरला मैके जाती, वो धड़ल्ले से मनपसंद वीसीडी देख लिया करते। स्खलन के क्षणों में साहनी साहब को अपनी इस नामुराद आदत पर ग्लानि होती। वे प्रण करते कि अब सादगी भरा संयमित जीवन जिएंगे। लेकिन क़समें तो तोड़ने के लिए ही खाई जाती हैं। वीसीडी किराए पर मिल ही जाती थी। कई वीडियो पार्लर वालों से साहनी साहब का व्यक्तिगत परिचय था। इन वीसीडीयों को साहनी साहब अपनी पर्सनल फ़ाईलों के बीच छुपा कर रखते ताकि बच्चों के हाथ न लगें।
साहनी साहब जब टूर पर होते तो होटल के कमरे में वीसीडी देखने का जुगाड़ बना लिया करते। होटल के नौकर चंद टुकड़ों की खातिर उनकी जी-हुजूरी करते।
एक बार की बात है। भोपाल की एक सीडी पार्लर में साहनी साहब पहुंचे। चेहरा-मोहरा, चाल-ढाल और गेट-अप से अधिकारी तो दिखते ही हैं। जब उन्होंने पार्लर के लड़के से इधर-उधर की सीडी खरीदने के बाद सीधे नीली फि़ल्मों की सीडी मांगी, तो वह उन्हें अजीबो-गरीब नज़र से देखने लगा और बोला--‘‘हम लोग ये धंधा नहीं करते।’’
साहनी साहब को बहुत बुरा लगा था। क्या करते, जबकि आए दिन छापामारी में इन्हीं जैसी सीडी की दुकानों से अवैध नीली फि़ल्मों का ज़ख़ीरा बरामद होता है। उन्हें अपनी आदत पर उस दिन कोफ़्त हुई थी। उन्होंने अपने को काफ़ी लानत-मलामत की थी। क्यों उन्हें इन फि़ल्मों का चस्का लगा हुआ है। कितनी बेइज़्ज़ती होती है। उन्होंने प्रण किया था कि अब वे स्वयं कभी इस तरह की सीडी नहीं खरीदेंगे। भले से पुरानी पड़ी सीडियों को हज़ार बार देख लेंगे।
कई बार आत्म-ग्लानि के क्षणों में उन्होंने फाईल में छुपाई हुई सीडियों को आवास के पिछवाड़े फेंका भी है लेकिन फिर जाने कैसे-कैसे नई सीडियां उन तक आ जाती हैं।
एक बार तो ग़ज़ब हो गया। जब उन्होंने नया-नया कम्प्यूटर चलाना सीखा था, तब एक बार पोर्न साईट्स पर एक ऐसा एडल्ट पाॅप-अप आया कि कम्प्यूटर की स्क्रीन पर आ जमा। उन्होंने कई तरकीबें की कि वह सीन स्क्रीन से ग़ायब हो जाए, लेकिन सीन हिला नहीं। उन्होंने टास्क-मैनेजर से उसे डिलीट करना चाहा। असफल रहे। कम्प्यूटर को शट-डाउन करना चाहा, नहीं हुआ। तब उन्होंने कम्प्यूटर को पावर आफ कर बंद किया। फिर दुबारा कम्प्यूटर आन किया तो एडल्ट सीन उसी तरह वाल-पेपर पर स्थिर था। वह घबरा गए। चूंकि बेटा तब छोटा था और कम्प्यूटर को सिर्फ वही चलाया करते थे। इसलिए उन्होंने चुपचाप कम्प्यूटर आॅफ किया और बाज़ार से दो हज़ार रूपए का एक एण्टी-वायरस ले आए। एण्टी-वायरस डालने के बाद कहीं जाकर कम्प्यूटर नार्मल हुआ था।
 
 
साहनी साहब का बेटा गौरव ग्यारहवीं का छात्र है। वह भी कम्प्यूटर पर काम है। सीधा-साधा सुशील बच्चा है गौरव। एकदम शर्मीला। हमेशा अपनी मम्मी के आंचल में पनाह लेने वाला। नगर में अच्छे ट्यूटोरियल नहीं है। इसलिए आन-लाईन कोचिंग की व्यवस्था की साहनी साहब ने। इसके लिए बच्चे का ईमेल आई डी भी बना दिया। गौरव अपनी आईडी पा कर बड़ा खुश हुआ। साहनी साहब ने उसका जीमेल एकाउण्ट बनाया था। गौरव साहनी साहब को आरकुटिंग करते देखा करता था। साहनी साहब ने कई बार गौरव को जीमेल पर चैट करते देखा और डांटा भी था कि समय बर्बाद न किया करो लेकिन गौरव कहां मानने वाला था।
गौरव का दोस्त था सोहन। बैंक मैनेजर का बेटा। इस दोस्ती के कारण साहनी साहब की बैंक मैनेजर से पहचान हो गई थी। शाम को गौरव, सोहन के घर चले जाता। कहता कि डाउट-क्लियर करते हैं वे और थोड़ा घूम-फिर लेते हैं। वह समय साहनी साहब का नेट पर बैठने का होता तो वह भी नहीं चाहते थे कि उनके घर में विध्न रहे और वह निष्कंटक इंटरनेट का मज़ा ले सकें। सरला कम्प्यूटर को अपनी सौतन कहा करती। बड़बड़ाते हुए उनके सामने चाय और बिस्किट रख दिया करती।
जूसी-पुस्सी के अलावा भी कई ऐसे आरकुटियन्स थे जिनसे साहनी साहब हाटीपाटी007 बनकर चैट किया करते थे। वह प्राईवेट मोड पर नेट चलाया करते और काम खतम करने से पूर्व सभी हिस्टरी को क्लियर कर दिया करते थे। यहां तक कि कूकीज़ को भी डिलीट कर दिया करते थे। वह नहीं चाहते थे कि कोई ये जान पाए कि उन्होंने कौन-कौन सी वेबसाईट्स पर सर्फिंग की थी।
 
 
एक दिन ग़ज़ब हो गया और साहनी साहब ने अंततः घर का ‘ब्राडबैंड कनेक्शन’ कटवा दिया।
हुआ ये कि साहनी साहब कार्यालय के काम से टूर पर गए।
वापस लौटे सुबह के दस बजे। गौरव की छुट्टी थी। घर में लाईट गोल थी। गौरव उनकी बाईक लेकर अपने दोस्त सोहन के घर गया हुआ था। साहनी साहब नहा-धोकर और नाश्ता करके रीते तब तक लाईट आ गई। उन्होंने सोचा कि इस बीच अपना इनबाॅक्स चेक कर लें। उन्होंने कम्प्यूटर आन किया। इंटरनेट कनेक्ट करके वेब-ब्राउज़र खोला। देखा कि आॅप्शन बाॅक्स पर लिखा आ रहा है--‘‘रिज़्यूम साईट्स’’ इसका मतलब था कि गौरव नेट चला रहा था कि लाईट चली गई थी। उन्होंने ‘यस’ पर क्लिक किया।
आॅरकुट का पेज खुल गया।
साहनी साहब तो जब भी नेट यूज़ करते आखिर में ‘साईन-आउट’ ज़रूर करते हैं, ताकि ‘रि-स्टार्ट’ करने में पेज बिना ‘लाॅगिन’ के न खुलें। इसका मतलब बेटे गौरव ने आरकुट पर काम किया था और अचानक लाईट चले जाने के कारण ‘साईन-आउट’ नहीं कर पाया होगा।
लेकिन यह क्या? खुला हुआ पेज तो ‘जूसीपुस्सी’ का था।
‘जूसीपुस्सी’ माने साहनी साहब की आरकुट फ्रेण्ड!
साहनी साहब के होश उड़ गए।
यानी अब तक जिस ‘जूसीपुस्सी’ से साहनी साहब ‘हाटीपाटी007’ नाम से चेटिंग किया करते थे, वह कोई सेक्सी लड़की नहीं बल्कि उनका अपना सपूत गौरव ही था।
इसका मतलब बेटा गौरव शाम को जो अपने दोस्त के घर खेलने नहीं जाया करता था, बल्कि नेट चलाने जाया करता था और ‘जूसीपुस्सी’ निकनेम से उनके साथ चैट किया करता था!
गौरव साहब ने माथा पकड़ लिया और आनन-फानन में इंटरनेट कनेक्शन नोच कर फेंक दिया।
 
सम्पर्क: अनवर सुहैल, टाईप 4/3, आफीसर्स कालोनी, बिजुरी, अनूपपुर मप्र 484440 09907978108