कुल पेज दृश्य

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

दो पाटन के बीच

उपन्यास अंश
दो पाटन के बीच
अनवर सुहैल
आटा-चक्की के कानफाड़ू 'खटपिट खटपिट' का शोर सलमा का कुछ नहीं बिगाड़ पाता। सलमा को जीवन की राह की तमाम दिक्कतों और परेशानियों से दो-चार होने में बड़ा मज़ा आता है।इसीलिए सलमा ने आटा-चक्की के बेसुरे 'खटपिट खटपिट' को एक ताल का रूप दे दिया और मन ही मन उस ताल पर एक गीत बना लिया है....'खटपिट खटपिट... खटपिट खटपिट....
सलमा खटती, दिन-भर खटती
कभी न थकती, कभी न थकती'
इसी लय में डूबती-उतराती सलमा अपने तन-मन की ज़रूरतों से आजकल बेख़बर रहती है।आटा-चक्की के साथ कब वक्त गुज़र जाता, सलमा जान न पाती। अल्लाह ने उसे इस काम में इतनी बरकत दी थी कि न कभी गेहूं ख़त्म होता और न कभी काम...जिसे गेहूं महीन पिसवाना हो वह महीन पिसवाए और जिसे मोटा चाहिए वह मोटा पिसवा ले... सलमा अपने ग्राहकों की फ़रमाईश दिल लगाकर पूरा करती ताकि मुहल्ले के लोग उसकी चक्की पर ही गेहूं पिसवाएं। सलमा ने चक्की के बाईं ओर रखी गेहूं की थैलियों की लाईन पर निगाह डाली। सोलह-सत्रह थैलियां। कुछ प्लास्टिक की बोरियां, कुछ कनस्तर और कुछ गेहूं भरे बोरे...आखिरी वाली थैली के पीछे एक मोटा सा चूहा झांक रहा था। सलमा ने चूहे को घुड़की दी। चूहा ठहरा ढीठ, सलमा को टुकुर-टुकुर ताकने लगा, जैसे उसका जन्मसिध्द अधिकार हो। तब सलमा ने आटा ठूंसने वाला मुगदर चूहे की तरफ़ फेंक मारा। चूहा सरपट भाग गया। आटा-चक्की में चूहे आएं भी क्यों न! चक्की बिठाने को बिठा ली थी सलमा ने, लेकिन आज तक उसके पास इतने पैसे न जुटे कि वह अंदरूनी दीवारों पर प्लास्तर करवा सके। दीवारों पर ईंट की जुड़ाई सीमेंट की जगह मिट्टी से की हुई है। चूहों, खटमलों और कनखजूरों के लिए तो जैसे स्वर्ग हों ऐसे घर...आटा-चक्की में कई तरह की चीज़ें पिसने आती हैं। चूहों के पास स्वाद बदलने के बहुत विकल्प थे।चूहे चाहे तो गेहूं पर हाथ साफ करें, या चने पर या मकई पर। इसीलिए सलमा लोगों की थैलियों पर लाया गया गेहूं या अन्य सामान तत्काल पीस दिया करती। वह नहीं चाहती थी कि चूहों की बदमाशियों का खामियाजा उसे या उसके ग्राहकों को भुगतना पड़े। मुहल्ले की एकमात्र आटा-चक्की है ये। लोग गेहूं, मकई, चना और चावल आदि सलमा की चक्की में पिसवाते हैं। सलमा के पास, यदि दिन भर और काम न भी आए तो भी तीन-चार घण्टे का काम हाथ में रहता ही है। लेकिन इस बिजली कटौती का क्या किया जाए? जैसे बारह बजा नहीं कि बिजली गुल हो जाया करती है। दुपहर बारह से तीन बजे तक बिजली कटौती रहती है। अब तीन बजे के बाद बिजली आएगी, तब बाकी का काम निपटाया जाएगा। ये सोचकर सलमा ने चक्की के फीडर को थोड़ा और खोल दिया ताकि सूपड़े पर बच रहा माल जल्द पाटों के बीच आकर पिस जाए। खटपिट खटपिट....खटपिट खटपिट.... आटा-चक्की के चलने से ऐसी ही आवाज़ उठती है।सलमा कभी भी 'बोर' नहीं होती।लेकिन सलमा ऐसे खुश भी नहीं होती।सलमा वक्त-बेवक्त रोती-सिसकती नहीं।अपनी चालीस साल की उम्र में उसने जीवन के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर बेरोक-टोक दौड़ने की सलाहियत पैदा कर ली है। वह जानती है कि इस संसार में, हर आदमी अपना 'सलीब' खुद ढोने के लिए अभिशप्त है।बाकी के रिश्ते-नाते सब संयोग मात्र हैं...ये महज़ एक इत्तेफ़ाक है कि कोई किसी की मां है, कोई किसी का बाप। संयोगवश कोई किसी का भाई है, कोई बहिन... दुनिया में जो कुछ भी दिखलाई देता है, सब संयोग ही तो है। क्या हमने चाहा था, कि हम इस संसार में आएं...जब हम अपनी मर्ज़ी से आए नहीं, तब इस दुनिया से शिकवा कैसा? सलमा को लता मंगेशकर का गाया एक गीत बहुत भाता है : 'दुनिया में जो आए हैं तो जीना ही पड़ेगा जीवन है अगर ज़हर तो पीना ही पड़ेगा' सलमा बिना किसी गिला-शिकवा के अपनी बहनों और बूढ़े अब्बू की अभिभावक है।वह चाहती कि सोने के घण्टों के अलावा वह सारा दिन खटती रहे। इतना खटे कि थक कर चूर हो जाए।ताकि रात एक भरपूर नींद की मालकिन बने।एक ऐसी नींद, जिसमें किसी तरह के ख्वाब न हों। अच्छे या बुरे कैसे भी ख्वाब देखना नहीं चाहती सलमा।सलमा जानती है कि भरपेट लोगों को ही ख्वाब बुनने और चुनने का हक़ है। जिनके हिस्से में हर दिन कुंआ खोद कर पानी पीने का अभिशाप हो उनके लिए अच्छा ख्वाब क्या अहमियत रखता है। 'मैं तन्हा था, मैं तन्हा हूं तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या?' सलमा ने बड़ी बेदर्दी से अपने सपनों का गला घोंटा है।व्ह चाहती है कि इसी तरह निरंतर खटती रहे।लेकिन इस बिजली की कटौती का क्या किया जाए? इस बार तो सरकार इसी वादे के कारण बनी थी कि हर नगर-गांव को बिजली की भरपूर खेप दी जाएगी। सत्ता पाते ही अपने वादे भूल जाते हैं ये नेता-परेता। पहले की तरह बिजली की कटौती ज़ारी है।दुपहर के ठीक बारह बजे लाईट चली जाती है।आदमी चाहे तो घड़ी मिला ले। हुआ भी वही, बारह बजे नहीं कि बिजली चली गई।अभी चक्की के सूपे में आधा माल अनपिसा ही रह गया था।हज्जन बीबी के घर का आटा था।अब तीन बजे के बाद जब लाईट आएगी, तभी काम हो पाएगा।हज्जन बीबी की नौकरानी आती होगी। कह रही थी कि सलमा बीबी बड़ी 'मरजेंसी' है, झट् से पीस देना। हज्जन बीबी बड़ा घुड़कती हैं।काम अधूरा जानकर वह ज़रूर चार बात सुनाएगी तो सुनाती रहे।सलमा पावर-हाउस की मालकिन तो नहीं,, और न कोई जिन्न-परी उसके बस में है कि बिना बिजली के आटा पीस दे।जिसे सलमा की चक्की में गेहूं पिसवाना हो पिसवाए वरना जहां जाना हो जाए। सलमा ने सोचा कि अब थोड़ा घर के अंदर की भी सुध ली जाए। बहनों ने कुछ किया भी है या सिर्फ लड़ाई-झगड़ा, बनाव-सिंगार में दिन गुज़ार दिया है।उसने दुकान के बाहर बैठे अब्बू पर निगाह डाली। अब्बू धूप की सेंक का आनंद ले रहे थे। कौन सा दिल है जिसमें दाग़ नहीं बाहर धूप में, फाईबर की कुर्सी पर आराम से अब्बू बैठे हुए हैं। उनकी पीठ पर कुनकुनी धूप पड़ रही है। अब्बू के पतले-दुबले बदन पर अम्मी के हाथों बुना बीसियों साल पुराना स्वेटर है। पहले उस स्वेटर का रंग बैंगनी हुआ करता था। अब वह मटमैली रंगत का हो चुका है।अब्बू बुत बने से धूप की सेंक का आनंद ले रहे हैं। ठंड के दिनों अब्बू की तबीयत नरम-गरम रहा करती है। अब्बू इसीलिए रोज़ाना नहीं नहाया करते। जुम्मा की नमाज़ भले वह अदा न करते हों, लेकिन जुम्मा के जुम्मा ज़रूर नहाते हैं। सलमा है कि ज़िद करके उनकी बनियान और लुंगी प्रतिदिन धो दिया करती है। अब्बू का मन करे तो वह महीनो कपड़े न बदलें। अब्बू की मैल से चीकट हुई बनियान धोते सलमा चिड़चिड़ा जाती-''चिल्लर पड़ गए कपड़ों में अब्बू, तुम नहाओ न नहाओ, एक-दो दिन के बीच लुंगी-गंजी तो धुलवा लिया करो।''अब्बू हंस देते और बड़ी मुहब्बत से उसे निहारने लगते। जाड़े के मौसम में अब्बू दुपहर में खाना खाने से पहले हाथ-मुंह मिज़ाज से धोया करते। इसके लिए सलमा सुबह धूप में एक बाल्टी पानी रख दिया करती। बारह-एक बजे तक बाल्टी का पानी धूप की सेंक पाकर कुनकुना-गर्म हो जाता। अब्बू उसी पानी से हाथ-मुंह धोते।सलमा को अपने अब्बू पर दया आया करती है। कितने कमज़ोर हो गए हैं अब्बू। किसी से कुछ नहीं कहते। बस सड़क पर आते-जाते लोगों को ख़ामोशी से ताकते रहते हैं। नगर के जिस इलाके में उनका घर है, उसे इब्राहीमपुरा के नाम से जाना जाता है। इब्राहीमपुरा यानी 'मिनी पाकिस्तान'। ये तो सलमा ने बाद में जाना कि हिन्दुस्तान में जहां-जहां मुसलमानों की आबादी ज्यादा है उस जगह को 'मिनी-पाकिस्तान' का नाम दे दिया जाता है।नगर में जहां हिन्दू आबादी ख़त्म होती है, इब्राहीमपुरा की बस्ती षुरू होती है। सलमा की चक्की एक तरह से सीमा पर स्थित है। उसकी चक्की के सामने जो सड़क निकलती है वह राम-मंदिर से आती है। रास्ते में बैंक और पोस्ट-ऑफिस है। फिर सब्जी-बाज़ार, उसके बाद बदबूदार मीट-मछली के अड्डे और उसके बाद इब्राहीमपुरा की सीमा। ये सड़क जाकर बड़ी मस्जिद पर ख़त्म होती है। सलमा की चक्की के पास ही बब्बन कस्साब की दुकान है। जहां सुबह सात बजे से रात आठ बजे तक बकरे का गोष्त मिल जाता है। बब्बन कस्साब के बगल में उसके छोटे भाई झब्बन की और सुल्तान भाई की बॉयलर मुर्गी और अण्डे की दुकान है। भरत कुर्मी और कुर्बान अली की मछली की गुमटियां भी उसी लाईन में है। सलमा को याद है कि उसकी हिन्दू सहेलियां इब्राहीमपुरा आने से डरती थीं। उन्हें लगता था कि मांसाहारी मुसलमान लोग आदमख़ोर भी हुआ करते हैं। संस्कृत पढ़ाने वाले उपाध्याय सर तो क्लास-रूम में सरेआम कहा करते थे कि ये मुसल्ले बड़े गन्दे होते हैं। सप्ताह में एक बार नहाते हैं, जुम्मा के जुम्मा। इनके घरों में अण्डा, मछली, मांस पकता है। इनके मुहल्ले में बड़ी गंदगी होती है। कई घरों के सामने बकरे-बकरियां बंधी होती हैं जो चौबीस घण्टे मिमियाती रहती हैं। मेंगनी करती और मूतती रहती हैं। मुर्गे-मुर्गियों की तो पूछो ही मत। इन सबके बीच ये मुसलमान अपने दिन-रात गुज़ारते हैं।इनके दिल में तनिक भी दया नहीं होती।ये जिस जानवर को बड़ी शान से पालते हैं, फिर उसी की गर्दन पर इत्मीनान से छुरी फेरते हैं।राम-राम, कितने निर्दयी होते हैं ये मुसल्ले...मुसलमानों में औरतों की कोई इज्ज़त नहीं। औरतें अक्सर बीमार रहा करती हैं। हर साल बच्चे पैदा करना मुसलमानों का मज़हब है। इसीलिए मुसलमानों के मुहल्ले में बच्चों की बड़ी तादाद होती है। न जाने क्यों मुसलमान ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं। नंगे-अधनंगे गंदे बच्चे गली-मुहल्ले में छितराए रहते हैं। बच्चों और औरतों के बदन में कपड़ा हो न हो, लेकिन इन मुसलमानों की रसोईयों में मांस ज़रूर पकना चाहिए। जब अपने लिए पाकिस्तान मांग ही लिया फिर यहां काहे जगह घेरने के लिए रूक गए ससुरे! कितनी कम आबादी थी इनकी यहां। नसबंदी का विरोध इन्होंने किया, क्योंकि इनके आका इन्हें बताते हैं कि आबादी बढ़ाकर अल्पसंख्यक से बहुसंख्यक कैसे बना जाता है? सलमा को उसकी हिन्दू सहेलियां इन्हीं सब कारणों से चिढ़ाया करतीं। उसकी पक्की सहेली मीरा ने एक दिन सलमा से पूछा था कि तुम लोगों में लड़कों को मुसलमान बनाने के लिए खतना किया जाता है लेकिन लड़कियों को कैसे मुसलमान बनाते हैं?सलमा क्या बताती। सलमा ने उस दिन के बाद मीरा से 'कट्टी' कर ली थी। क्या फ़ायदा ऐसी लड़कियों से दोस्ती करके। जब उन्हें उसका मज़ाक ही उड़ाना है।स्कूल में भी तो जब देखो तब पूजा-पाठ होता रहता है, क्या रखा है इस पूजा-पाठ में। क्या पत्थर के देवी-देवता या तस्वीरों को पूजने से इनका भला होगा? वह तो उनकी हरकतों पर कभी ऐतराज़ नहीं करती है। और ऐसा नहीं है कि सलमा पूजा में शामिल नहीं होती थी। उसे आरती तक याद है। चरणामृत कैसे लिया जाता है, आरती के बाद दीपक की लौ की सेंक कैसे ली जाती है, प्रसाद कैसे दाहिने हाथ के नीचे बांई हथेली रखकर ग्रहण किया जाता है। वह सब जानती है। उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि वह एक मुसलमान लड़की है। फिर उसके मज़हब का ये लोग क्यों मज़ाक उड़ाते हैं, सलमा समझ न पाती।सलमा जानती है कि लोग मुसलमानों से चाहे कितनी नफ़रत करें, लेकिन गाहे-बगाहे उन्हें अब्बू की शरण में आना ही पड़ता है।अब्बू के हाथ में जादू जो है।बड़ा हुनर दिया है अल्लाह-पाक ने उनके हाथों में। अपनी जवानी के दिनों में पहलवान हुआ करते थे अब्बू। उनका नाम था महमूद जो कि बिगड़कर बन गया था 'मम्दू पहलवान'। अम्बिकापुर के नामी पहलवान बन्ने मियां की शागिर्दी की थी उन्होंने। बन्ने मियां हड्डी और नस के अच्छे जानकार थे। अब्बू ने पहलवानी से ज्यादा बन्ने मियां से हड्डी और नस की डॉक्टरी जान ली थी।हड्डियों के जोड़-जोड़ की जानकारी उन्हें है।जिस्म की तमाम नसों को अपने इशारे पर नचा सकते हैं वो। नगर के पुराने लोग अभी भी उनके पास हड्डियां बिठाने या फिर राह भटकी नसों को सीधी राह पर लाने के लिए आया करते हैं। ऐसे तमाम ज़रूरतमंद लोगों को अब्बू सुबह बुलाया करते।चाहे मरीज़ कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हो, कुसमय इलाज नहीं करते। ये कहकर लौटा देते-''सुबह आओ...नसों की सही जानकारी सुबह ही मिलती है।'' सलमा की नींद सुबह फजिर की अज़ान की आवाज़ से न खुल पाई तो फिर अब्बू के मरीज़ों की आमद से खुलती है।अलस्सुबह लोग चक्की वाले कमरे से लगे बाहरी कमरे की सांकल बजाते हैं। ''पहलवान'च्चा!'' या फिर 'मम्दू पहलवान हैं क्या?'' अब्बू बिस्तर से उठते नहीं। बिस्तर पर लेटे हुए सलमा को आवाज़ देते हैं-''देख तो बेटा, कौन आया है?''अब्बू की एक आवाज़ पर सलमा झटके से बिस्तर छोड़ती है। चेहरे पर दोनों हथेलियां फिराकर अंदाज़ से बाल दुरस्त करती है। फिर जल्दी से कपड़े की सलवटें ठीक करती, दुपट्टा गले पर डालते हुए चक्की के मेन-गेट पर लगे ताले को खोलने चली जाती है। बाहर खड़े लोगों के चेहरे पर दर्द की लकीरें देख वह उन्हें अंदर आने का इशारा करती।चक्की का अंधेरा गलियारा पार कर आंगन के बाद रसोई से लगा कमरा अब्बू का है।अब्बू की चारपाई के बगल में एक स्टूल रखा है।मरीज़ उस पर बैठ कर अपना दुख बताता। ''बहुत दर्द कर रहा है ये वाला पैर, इसे ज़मीन पर रखूं तो जैसे जान निकल जाती है।'' मरीज़ ज़मीन पर पैर जमा कर खड़ा होने की कोशिश करता और उसके मुंह से कराह निकल जाती।अब्बू बिस्तर पर पड़े टुकुर-टुकुर उस मरीज़ को निहारते, कुछ नहीं कहते। फिर लिहाफ़ हटा कर उठ बैठते। तकिए के नीचे से बीड़ी का कट्टा और माचिस निकालते। एक बीड़ी सुलगाते और फिर मरीज़ को स्टूल पर बैठने का इशारा करते।इत्मीनान से बीड़ी फूंक कर चारपाई से उठते और ज़मीन पर उकड़ू बैठ कर मरीज़ की एड़ियों को इधर-उधर घुमाते। मरीज़ दर्द से कराहने लगता। अब्बू के पतले-पतले हाथ उसके घुटने के पीछे जाकर जाने क्या करतब करते कि मरीज़ एक गहरी आह भर कर चुप हो जाता।अब्बू वापस अपनी चारपाई पर बैठ जाते और मरीज़ से कहते कि एक-दो बार पैर झटको।वह ऐसा ही करता।आश्चर्य! मरीज़ के चेहरे पर छाई दर्द की लकीरें अब नहीं दीखतीं। मरीज़ अब्बू को बड़े आदर से देखता तो अब्बू कहते कि नस चढ़ गई थी। गरम पानी में नमक डाल कर पैरों को दो-तीन बार धो लेना। मरीज़ इलाज से संतुष्ट होकर अपनी जेब टटोलता। अब्बू की फीस मात्र दस रूपए है। चाहे उन्हें उस हड्डी को बिठाने में एक घण्टे लग जाएं या फिर एक पल...अब्बू पैसा अपने हाथ से नहीं छूते। तकिया उठाकर इशारे से कहते कि तकिए के नीचे पैसा रख दो।मरीज़ तकिए के नीचे रूपए डाल कर बड़ी श्रध्दा से उन्हें देखता।आज के ज़माने में इतना सस्ता इलाज! कस्बे में अब तो कई लोग हैं जो इस हुनर के जानकार हैं, लेकिन मम्दू पहलवान की बात ही और है।भूले-भटके एक-दो मरीज़ हर दिन अब्बू को मिल ही जाते हैं, जिससे उनकी शाम की दारू का खर्च निकल आता है। सलमा के ख़ानदान की मुहल्ले में कोई क़द्रो-क़ीमत नहीं है। इसका कारण सलमा जानती है। जैसे कि अब्बू की पियक्कड़ी, अम्मी और मौलाना के क़िस्से, सलमा का घिनौना अतीत...वैसे इस ज़माने में दूध का धुला कोई नहीं। हरेक चादर दाग़दार है आजकल, लेकिन धन-दौलत का पर्दा बदनामियों को ढंक लेता है और ग़रीबों की बदनामियां जंगल की आग बन कर फैल जाती हैं। सलमा जानती है कि इस हमाम में सभी नंगे हैं.... कौन सा दिल है जिसमें दाग़ नहीं! बस, ज़माने का दस्तूर यही है कि जो पकड़ाए वही चोर.... अपनी हिम्मत है, हम फिर भी जिए जाते हैं क्या है कि अपने धुन की पक्की सलमा किसी की परवाह नहीं करती।उसने अपनी इस छोटी सी ज़िन्दगी में बड़े अनुभव बटोरे हैं। उसने संसार की कई ऐसी हक़ीक़तें जान लीं थीं, जिनके लिए एक इंसान को कई-कई जन्म लेना पड़े। मसलन सलमा जानती है कि लड़के और लड़कियों में फर्क है। लड़कियां दब्बू, शर्मीली, डरपोक, वाचाल, बनावटी और कमज़ोर सी होती हैं जबकि इसके बरअक्स लड़के दबंग, बिंदास, निडर, उद्दण्ड, शातिर और जिस्मानी तौर पर मज़बूत होते हैं। लड़कियों में आत्मविश्वास की कमी होती है जबकि लड़के असम्भव से काम भी करने का प्रयास करते हैं।लड़कों की श्रेष्ठता के पीछे कोई आसमानी-वजह नहीं है। जन्म से ही लड़कों को लड़कियों की तुलना में ज्यादा प्यार-दुलार, पोषक-आहार, उचित देख-भाल, सहूलियतें और आज़ादी मिलती है। लड़के पूरे परिवार की आंख का तारा होते हैं और लड़कियां आंख का कीचड़ नही तो और क्या होती हैं?इसीलिए तो लड़कों में आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा रहता है। बचपन में भकुआए से भोंदू दिखने वाले लड़के बड़े होकर कितनी जल्द राज करना सीख जाते हैं और ज़िम्मेदारियां उठाती वाचाल लड़कियां बड़ी होकर कांच के सामान की तरह हो जाती हैं, जिन्हें बड़ी होशियारी से इस्तेमाल किया जाता है कि कहीं टूट न जाएं। सलमा ने अपने अनुभवों से जान लिया था कि ये संसार एक प्रयोगशाला है, जहां इंसान ग़ल्तियां कर-करके सीखता है, क्योंकि जीना एक कला है और विज्ञान भी। इसमें लड़की या लड़के में कोई अंतर नहीं होता।सलमा अच्छी तरह जानती है कि अच्छे-अच्छे तुर्रम ख़ाँ, भूख और ग़रीबी के आगे मात खा जाते हैं। अच्छे-अच्छे विवेकवान लोग अभाव की चक्की में पिस कर कुंद हो जाते हैं। ऐसे हालात का मारा इंसान, हराम-हलाल, पाप-पुण्य और स्वर्ग-नर्क की बातों को ठेंगे पर रखकर किसी तरह अपना जीवन बसर करता है।ये नहीं सोचता कि जो उसके हिस्से में आई रोटी, हराम की कमाई है या हलाल की। गर्म तवे पर पानी की बूंद डालो तो छन्न से ग़ायब हो जाती है।गरीब का आवष्यकताएं गर्म तवे की तरह होती हैं, जिसमें सुविधाओं के छींटे पड़ते ही ग़ायब हो जाते हैं। इन्हीं घनघोर अभावों से दो-चार होती सलमा कब सयानी हो गई, वह जान न पाई। उसे हालात ने सयाना कर दिया था। वह अभी दस साल की ही थी कि उसकी अम्मी घर छोड़कर चली गई।अब्बू उस सदमे को झेल न पाए और नीम-पागल हो गए।यदि दारू का सहारा न होता तो कब के मर-बिला गए होते अब्बू।सलमा घर में बड़ी थी। सलमा बाहरी दुनिया के छल-प्रपंच से अन्जान तो थी, लेकिन असावधान नहीं थी। जीने के लिए उसने अपने स्तर पर कई तरह के चांस लिए। एक भोली-भाली लड़की से किशोरी और फिर युवती बनने का सफर, जोखिम भरे रास्तों पर, तने-तन्हा तय किया था सलमा ने।पहले-पहल तो वह बहुत हताश रहा करती थी। फिर ज़माने की ठोकरों से उसने जान लिया कि औरत को अल्लाह ने मर्दों की तुलना में एक अतिरिक्त कुदरती औजार दिया है। जिस्म का हथियार।जिसे जब चाहे औरत इस्तेमाल कर अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकती है...चाहे तो दौलत का अंबार लगा सकती है। जिसके पास दौलत नहीं उसके लिए कैसा घर, कैसा दर, कैसा समाज, कैसा वतन...एक बार दौलत पास आ जाए, फिर संसार में और कोई मुश्किल नहीं! तिरिया-चरित्तर उर्फ धोखा ही धोखा अब्बू इतने कमज़ोर पहले न थे। चक्की के बाहर कुर्सी डाले बैठे-बैठे बीड़ी फूंकते रहते हैं और शाम गहराते ही दारू पीने के चक्कर में भट्टी की तरफ चले जाते हैं।अब यही उनका शगल है।जब से अम्मी ने अब्बू का दामन छोड़ा अब्बू की ये हालत हो गई है। सलमा की छोटी बहन रूकैया एकदम अम्मी पर गई है। वैसे ही साफ रंगत, पानीदार चेहरा, कटीली आंखें, भरे-भरे गाल!अब्बू जब भी रूकैया को देखते सर्द आहें भरा करते।अम्मी थीं भी रूई के फाहे जैसी नर्म-मुलायम और किसी शाहज़ादी जैसी नफ़ासत-नज़ाकत से लबरेज़। कोई सोच भी नहीं सकता था कि एक मामूली आटा-चक्की चलाने वाले के घर इतना क़ीमती ज़ख़ीरा होगा। अम्मी की पुरानी फोटो जब कभी सलमा देखती तो उसे एकदम फ़रीदा जलाल याद आती। अम्मी के गाल पर फ़रीदा जलाल जैसे डिम्पल बनते थे। बदनसीब अब्बू के पास सिवाए ग़रीबी और भुखमरी के और कोई दौलत न थी। यही ग़रीबी उनके सुख-चैन की दुश्मन बनी।अब्बू हाजी जी की आटा चक्की में मुलाज़िम हुआ करते थे। हाजी जी पुराने मुलाजिम थे। चक्की की रिपेयर खुद से कर लिया करते थे। हाजी जी की चक्की में कई तरह के काम होते थे। उनके पास धान कूटने की, तेल पेरने की, मसाला पीसने की और अब चाहे वह धान से चावल निकालने वाली चक्की हो, तेल पेरने वाली चक्की हो या फिर गेहूं, मसाला आदि पीसने वाली चक्की। अब्बू चक्की में लगने वाले भारी गोलाकार पत्थर की टंकाई का काम खुद किया करते थे। उनके पास छोटी-छोटी धारदार कई तरह की छेनियां थीं और कई हथोड़ियां भी थीं। हाजी साहब अब्बू को बहुत मानते थे। ईद-बकरीद के मौक़े पर बख्षीश बतौर सलमा के सारे परिवार के लिए कपड़े हाजी जी के घर से आया करते थे। छोटी-छोटी खुशियों के साथ ज़िन्दगी के दिन ठीक ही गुज़र रहे थे।फिर भी जाने क्यों अम्मी का दिल उस घर में नहीं लगता था।तीन-तीन बेटियां जनने के बाद भी अब्बू उनसे बेइंतेहा प्यार करते थे। उन्हें किसी किस्म की तकलीफ न हो इसका पूरा ध्यान रखते थे। अब वह चाहे कपड़े धोना हो, या बाहर से पानी लाना या फिर बच्चों के पोतड़े धोना। अब्बू अम्मी को पूरा आराम देते और सारे काम खुद ही निपटा दिया करते थे। जब सलमा बड़ी हो गई तो उसने भी अब्बू का हाथ बटाना षुरू कर दिया था। जब-तब अब्बू सुबह की रोटियां खुद ही बना-खाकर काम पर चले जाते थे। वह नाहक अम्मी को आवाज़ लगाकर जगाते न थे। अम्मी के अंदर फुर्ती का अभाव था।वह बेहद आलसी थीं।पानी-पानी चिल्लाती पड़ी रहती थीं लेकिन खुद उठकर एक गिलास पानी नहीं पी पाती थीं। हां, इसका मतलब ये नहीं कि वह आलसी थीं तो खुद को गंदा रखती होंगी। ऐसा क़तई न था। अम्मी सुबह जब भी उठतीं, बिस्तर पर ही छोटे आईने में अपना चेहरा ठीक करतीं। फिर नित्य-कर्म से फुर्सत पाकर आंगन वाले बड़े आईने के सामने खड़े होकर अपने लम्बे बालों पर कंघी करतीं और चेहरे पर सस्ता पाउडर लगातीं। आंखों पर सुरमा डालतीं। सलमा पर अम्मी हमेशा गुस्सा किया करतीं कि सलमा उनकी लिपिस्टिक को बरबाद कर दिया करती थी। फिर जब सुरैया थोड़ी जानकार हुई तो वह भी लिपिस्टिक-पाउडर की दुश्मन हुआ करती थी। सलमा के जेहन में हल्की सी याद है उस नामुराद मौलाना क़ादरी की, जिसने अम्मी को अपने वाग्जाल में फंसाया था। मौलाना क़ादरी जब से उस क़स्बे में आया, लोगों का जीना मुहाल कर दिया था...बात-बे-बात जामा मस्जिद के बड़े हाफिज्जी की ग़ल्तियां निकाला करता था और उन्हें नीचा दिखाया करता था। वह चाहता था कि मस्जिद में बड़े हाफिज्जी की इज्ज़त कम हो जाए। किसी तरह उसकी धाक जम जाए तो फिर पौ बारह... बड़े हाफिज्जी दीनो-मजहब के बड़े जानकार थे। उनका जीवन परहेज़गारी का नमूना था। वे बड़े संयमी और सुलझे हुए इंसान थे। जाहिल मुसलमानों को नमाज़ और रोज़े की पाबंदी के लिए हमेशा इस्लाह किया करते थे। वे इंसानी जिन्दगी के तमाम मसाईल का हल नमाज़ के ज़रिए निकालने की समझाईश दिया करते थे। वे चाहते थे कि मुसलमान अपने काम से समय निकाल कर दिन में पांच बार खुदा को याद करे। वे गण्डा-तावीज़, झाड़-फूंक आदि से जाहिल मुसलमानों को बरगलाया नहीं करते थे। वे कहते थे कि बीमार पड़ने पर अल्लाह से रहम की भीख मांगो। ठीक न हो तो फिर कस्बे के डॉक्टर के पास ले जाओ। इंशाअल्लाह शिफ़ा मिलेगी...बड़े हाफिज्जी अक्सर अपनी तकरीरों में कहते कि अल्लाह को पाने के लिए कोई आसान नुस्खा नहीं है। इसके लिए जितनी इबादत की जाए कम है। इंसान को ज्यादा से ज्यादा समय अल्लाह की गुणगान करना चाहिए और बुराईयों से बचना चाहिए। पांच-छह सौ मुसलमानों की ऐसी बस्ती का इकलौता धर्मगुरू बनने का ख्वाब मौलाना क़ादरी को सताया करता था। मस्जिद के रख-रखाव और इमाम-मुअज्जिन की तनख्वाह वग़ैरा के लिए बस्ती के मुसलमान चंदा दिया करते थे। बड़े हाफिज्जी की देख-भाल में मस्जिद के सहन में एक मदरसा भी चलाया जाता था जिससे बच्चों की दीनी-तालीम मिल जाती थी। इसका मतलब ये था कि यदि मौजूदा बड़े हाफिज्जी को उखाड़ फेंका जाए तो मौलाना क़ादरी के दिन फिरते देर न लगे। इसीलिए मौलाना क़ादरी, बड़े हाफिज्जी के ख़िलाफ़ अवाम को भड़काया करता और अपना उल्लू सीधा किया करता था।कम पढ़े-लिखे, धर्म-भीरू, आस्थावान आदमियों और जाहिल औरतों को मौलाना क़ादरी उकसाया करता कि नमाज़-रोज़ा से कुछ नहीं हासिल होता। दोनो जहान में निजात पाने के लिए किसी भी तरह अपने घरों में मीलाद-शरीफ की महफिल सजाओ तो बरकत टपके। मीलाद-शरीफ के आयोजन का मतलब था कि कम से कम चार-पांच सौ रूपए की चपत। मीलाद-शरीफ के खात्मे पर बांटी जाने वाली शिरनी (प्रसाद) लाओ। इत्र-फुलेल, अगरबत्ती की व्यवस्था करो। माईक-बाजा लगवाओ। मीलाद के बाद खाने की दावत न दो तो लोग नहीं जुटते। खाली मिलाद सुनने क्यों आएं लोग। सो तीस-चालीस आदमियों के लिए गोष्त-पुलाव-ज़र्दा का बंदोबस्त?मीलाद-शरीफ पढ़ने का नज़राना कम से कम एक सौ एक रूपए मौलाना क़ादरी के लिए...मैलाना क़ादरी की आवाज़ बड़ी दिलकश थी। वह जब नात-शरीफ़ पढ़ते तो लगता जैसे मुहम्मद रफी बिना संगीत के गीत गा रहे हों। उनके अधिकांश नातों की तर्ज पुराने फिल्मी गानों की पैरोडी टाईप हुआ करती थीं-सलमा जानती है वे गाने जिन की धुन पर मौलाना क़ादरी नात तैयार करते थे।जैसे, 'गुज़रा हुआ ज़माना, आता नहीं दुबारा, हाफ़िज़ खुदा तुम्हारा', 'सौ साल पहले मुझे तुमसे प्यार था, आज भी है और कल भी रहेगा', या 'मुहब्बत की झूठी कहानी पे रोए' आदि गानों की तर्ज़ पर नात तैयार की जाती थीं, जो सुनने में बड़ी मधुर लगतीं।इसीलिए गरीबी-बेकारी और अशिक्षा से जूझते बस्ती के मुसलमानों में उनके नातिया कलाम लोकप्रिय होने लगे थे। अम्मी अक्सर मौलाना क़ादरी के नातिया कलाम को गुनगुनाया करतीं। मौलाना क़ादरी अब्बू से मिलने एक बार सलमा के घर आए। अब्बू तो काम पर गए थे। सलमा तब छोटी थी।उसने तो मौलाना क़ादरी को ये कह कर टरकाना चाहा था कि अब्बू काम पर गए हैं, लेकिन अम्मी ने कहा कि मौलाना को टपरिया में बिठाओ।तब आंगन और सड़क के बीच में जहां आज चक्की है, वहां पर टट्टर से घेर कर खपरैल की छप्पर वाली एक बैठकी बनाई गई थी। अब्बू उसे टपरिया कहा करते थे।उसमें एक चारपाई डली रहती थी। अब्बू को बकरियां पालने का षौक़ था, और रात में बकरियां उसी जगह बांधी जाती थीं।मौलाना क़दरी टपरिया में बिछी चारपाई पर आ बैठे। नन्ही सलमा ने ग़ौर किया कि उनकी निगाहें उसे घूर कर देख रही हैं। जाने क्यों सलमा को वह अच्छे आदमी नहीं लगे। गर्मियों के दिन थे। सुबह के दस-ग्यारह बजे होंगे, लेकिन लगता ऐसे था जैसे दुपहर के दो बज रहे हों। गर्मी बेहद थी। मौलाना क़ादरी कंधे पर डाली गई हरे-सफेद चौखाने वाले गमछे से पंखा करने लगे। उनकी निगाहें बार-बार झोंपड़ी के अंदर का जाएज़ा लेती दिखलाई पड़ रही थीं। अम्मी उस समय आंगन के कोने में बोरे से घेर कर बनाए गए गुसलखाने में नहा रही थीं। अम्मी की एक बहुत ही गंदी आदत थी, जिससे सलमा को काफ़ी चिढ़ हुआ करती थी। होता ये था कि अम्मी जब भी गुसलखाने से नहाकर बाहर निकला करतीं, उनके गीले जिस्म पर सिर्फ लहंगा और ब्लाउज़ हुआ करता था। सीने पर वह गीला गमछा डाल कर गुसलखाने से झोंपड़ी की तरफ लगभग भागते हुए घुसा करती थीं। इतने कम समय में भी उनकी नारी-देह की भरपूर नुमाईश हो जाया करती थी। उस दिन भी ऐसा ही हुआ। अम्मी को जबकि मालूम था कि बाहर टपरिया में मौलाना क़ादरी आकर बैठे हुए हैं। फिर भी वे गुसलखाने से अपने उघड़े जिस्म को सहेजते भागती हुई झोंपड़ी के अंदर घुसीं, लेकिन मौलाना क़ादरी की निगाहों को देर तक सलमा ने उस रास्ते का जायज़ा लेते पाया। कपड़े पहन कर, अपने गीले बालों पर गमछा लपेटे अम्मी जब बाहर आईं तो बला की ख़ूबसूरत लग रही थीं। गर्मी की शिद्दत से मौलाना बेचैन थे।अम्मी ने मौलाना क़ादरी की अच्छी ख़िदमत की थी। अम्मी ने सलमा को नींबू का शर्बत बना लाने को कहा। पता नहीं अम्मी और मौलाना क़ादरी में क्या-क्या बातें होती रही थीं। मौलाना क़ादरी फिर अक्सर उनके घर आने लगा। अब्बू सुबह काम पर निकलते तो फिर देर रात घर वापस आते। अगर काम का दबाव ज्यादा रहा तो फिर पूरी रात घर न आते। मौलाना क़ादरी आते तो जाने क्यों नन्हीं सलमा को बहुत बुरा लगता था। लगता भी क्यों न! वह बच्ची थी तो क्या अच्छाई-बुराई की कुदरती समझ तो हर उम्र में इंसान को होती है।मौलाना क़ादरी ने एक दिन उसे बड़े प्यार से अपने पास बुलाया था।वह शर्माते-शर्माते उनके पास गई। मौलाना ने उसे अपनी गोद पर बिठाया और उसके गाल को चूमा।सलमा ने झट से अपने गाल साफ किए। मौलाना ने उसके गाल पर थूक लगा दिया था। सलमा को इस तरह प्यार करने वाले इंसान क़तई पसंद न थे। वह तत्काल उनकी गोद से उछलकर भाग गई थी। मौलाना क़ादरी गोरे-चिट्टे थे। चेहरे पर तराशी गई खूब घनी काली दाढ़ी। हल्की मूंछें। सर पर काली टोपी। गरदन तक लहराते बाल। कपड़े बड़ी नफ़ासत वाले। चेहरे पर सेहतमंद मुस्कान। किसी तरह के तनाव के कोई निशानात नहीं। चिन्ता-फ़िक्र से आज़ाद बिन्दास शख्सियत। दीनदार लोग ऐसे चेहरे को देख कह ही बैठें कि सुबहानल्लाह! बेशक, अल्ला-वालों का चेहरा ऐसा ही नूरानी हुआ करता है। सलमा की अम्मी कब मौलाना की दीवानी बन गईं उन्हें पता न चला... सलमा को वो दिन आज भी याद है जब उसने अपनी अम्मी और मौलाना क़ादरी को अन्दर वाले कमरे में अब्बू के बिस्तर पर गुत्थम-गुत्था देखा। अम्मी नीचे दबी हुई थीं। मौलाना अम्मी पर सवार थे। अम्मी के गले से दबी-दबी ऊ... आं... की आवाज़ें निकल रही थीं। वो माज़रा देख सलमा डर गई। वह शबे-बरात का दूसरा दिन था।उसकी समझ में जब कुछ न आया तो वह दौड़ी-दौड़ी हाजी साहब की चक्की जा पहुंची। वहां अब्बू तेल पेरने वाली मशीन से डोरी का तेल निकाल रहे थे। सलमा को आया देख उन्होंने मशीन का स्विच ऑफ किया और सलमा को अपने पास बुलाया।सलमा की सांसें फूली हुई थीं। उसने फुसफुसाते हुए अब्बू को घर का आंखों देखा हाल कह सुनाया। अब्बू भागे-भागे सलमा के साथ घर आए।देखा कि सुरैया और नन्हीं रूकैया आंगन में एक चारपाई पर सोई हुई हैं और झोंपड़ी का दरवाज़ा भिड़का हुआ है।अब्बू ने दबे पांव दरवाज़ा खोला तो भीतर का हाल देख दंग रह गए।अम्मी को काटो तो खून नहीं और मौलाना क़ादरी झटपट कपड़े उल्टे-सीधे पहन भाग लिए। अब्बू कहें तो कहें किससे।उन्हें ज़बरदस्त सदमा पहुंचा। वे फिर कई दिनों चक्की नहीं गए। अम्मी और अब्बू में बोल-चाल बंद हो गई।उधर एक दिन सलमा बाहर खेल रही थी कि उसे मौलाना क़ादरी दिखलाई दिए।सलमा ने देखा कि अम्मी घर के बाहर टपरिया तक आई हैं। फिर मौलाना क़ादरी और अम्मी में जाने क्या बातें हुईं वह जान न पाई।उसने सोचा था कि वह अब्बू को इस मुलाक़ात के बारे में बताएगी, लेकिन वह खेल की धुन में भूल गई। सलमा को याद है कि उस रात अम्मी ने बड़े शौक़ से खाना बनाया था।घर में कुछ ख़ास था नहीं, हां, आलू की रसेदार सब्ज़ी में अम्मी ने आमलेट के टुकड़े तैरा दिए थे। आमलेट जब शोरबे में तर हो जाता है तो बहुत अच्छा लगता है। अपनी दोनों बहनों के साथ सलमा ने बहुत चटख़ारे लेकर उस सब्ज़ी को खाई थी। सुबह उसे अब्बू ने जगाया और अम्मी के बारे में पूछा, तो सलमा उनींदी क्या बताती? उसने सोचा कि अम्मी शायद टहलने गई हों, कुछ देर में आ जाएंगी। सूरज आसमान पर चढ़ता गया लेकिन अम्मी न आईं। सुरैया और रूकैया अम्मी-अम्मी की रट लगाकर खूब रो रही थीं। सलमा ने अब्बू के कहने पर मुहल्ले में आस-पास अम्मी को खोज देखा। कुछ पता न चला।दुपहर को जुहर की अज़ान के वक्त अब्बू घर आए।उनके क़दम लड़खड़ा रहे थे। उन्होंने पी रखी थी।सलमा उन्हें देख कर रो पड़ी।उसे अम्मी की याद सता रही थी।अम्मी जाने कहां चली गई हैं।अब्बू लड़खड़ाती ज़ुबान से अपनी बीवी को गाली बक रहे थे, साथ-साथ मौलाना क़ादरी की दइया-मइया एक किए हुए थे।तब जाकर नन्हीं सलमा को समझ में आया कि अम्मी का चक्कर क्या है? उसने अब्बू को बताया भी कि अब्बू, कल दुपहर के समय मौलाना क़ादरी अम्मी से मिलने आए थे।अब्बू ने उसे घूर कर देखा था, फिर वह निढाल होकर टपरिया पर पड़ी चारपाई पर पसर गए थे।सलमा उस दिन अचानक एक ज़िम्मेदार औरत में तब्दील हो गई थी।वह लकड़ी का चूल्हा सुलगाकर काली चाय बनाना जानती थी।उसने सुरैया और रूकैया को चुप रहने का इशारा किया और रसोई में जा घुसी थी।बड़ा अजीब लगा था बिना अम्मी के रसोई-घर...चूल्हा अम्मी रात ही साफ़ करके गई थीं। उसने एक कोने में रखा आटे का कनस्तर टटोला। उसमें आधा कनस्तर आटा था। फिर उसने चूल्हे के पास रखे कई डिब्बों को खोलकर देखा। किसी में शक्कर, किसी में चायपत्ती, किसी में नमक और किसी में गरम मसाला था। उसने आटा माड़ने वाली थाली लेकर पहले अंदाज से आटा गूंथ लिया। फिर लकड़ी सुलगाने लगी कि अब्बू आ गए। वह माथा पकड़ कर वहीं सलमा के पास पीढ़े पर बैठ गए।आग सुलग जाने पर सलमा ने तवा चढ़ाकर उसे गर्म होने दिया।सुरैया और रूकैया तब तक उसके पास आ चुकी थीं रूकैया तो अब्बू की गोद में दुबक गई, लेकिन सुरैया अपने नन्हे-नन्हे हाथों से आटे की लोई बनाने लगी।सलमा ने बेलन-चौकी पर रोटी जो बेलनी षुरू कीं तो पतली-मोटी, टेढ़ी-मेढ़ी रोटियां फटाफट बनने लगीं।पहली रोटी उसने शक्कर के साथ रूकैया को खाने को दी। अब्बू ने रोटी के अंदर शक्कर भरकर उसका 'रोल' बना दिया।रूकैया मरभुक्खों की तरह दांत से काट-काट कर गपागप रोटी खाने लगी तो अब्बू कीआंखों में आंसू आ गए। उन्होंने जान लिया कि उनकी बड़ी बिटिया 'हुशियार' हो गई है, वह बाकी बच्चों को सम्भाल लेगी। सलमा ने कमसिनी में ही जिस्म को हथियार बनाने की कला सीखी थी। तब वह कक्षा आठ की छात्रा थी।ये भी कोई उम्र होती है, जिस्म के पोशीदा राज़ जानने की?लेकिन क्या करें इस समाज का, जहां लोग ग़रीब की लड़की को घूर-घूर कर जवान बना देते हैं।देह की दौलत के नाम पर क्या था सलमा के पास। महज़ ग़रीबी की मार खाई सूखी सी काया, सूखे से हाथ-पैर, कंकाल-नुमा चेहरे पर चुंधियाई आंखें और बाहर को निकले दांत...इतने बेरौनक जिस्म को भी लोलुप आदमी जाने किस चमक की आस में घूरते रहते हैं।देह के भौतिक, रासायनिक और जैविक स्वरूप की जानकारी का पाठ पढ़ाने वाले प्रथम पुरूश को सलमा भला कैसे भूल सकती है।वह महाशय गंगाराम सर ही तो थे। उनका एक पैर कुछ छोटा था, जिस के कारण उनकी चाल में थोड़ी लचक थी। इसीलिए बच्चे और बड़े पीठ पीछे उन्हें 'तैमूरलंग' कहा करते थे। गंगाराम सर के सिर पर खूब घने बाल थे, ऐसा लगता जैसे विग लगाए हुए हों। उनकी किचड़याई रहती थीं। वह गणित पढ़ाया करते थे।सलमा को स्कूल का माहौल अच्छा न लगता और ख़ासकर गंगाराम सर तो एकदम भी नहीं ।गंगाराम सर नगर के खाते-पीते घरों बच्चों की तरफ ज्यादा ध्यान दिया करते थे। ग़रीब बच्चों का मज़ाक उड़ाया करते थे।सलमा ग़रीब थी, पढ़ाई में कमज़ोर थी और मुसलमान भी थी।इसलिए उसे कक्षा में पिछली बेंच बैठना पड़ता था। अक्सर गंगाराम सर पिछली बेंच के बच्चों को खड़ा कर कठिन-कठिन प्रष्न पूछा करते और ज़ाहिर है कि वे उत्तर न जानते थे। नतीजतन गंगाराम सर छड़ी से उनके हाथ लाल कर देते थे। सलमा अक्सर उनसे पिटती थी।बाद में उसने जाना कि गंगाराम सर पीटने के बहाने उसकी पीठ, कंधे और बांह की थाह लिया करते हैं। फिर उसे लगता कि हो सकता है ये उसका वहम हो।वह किसी से कुछ न कहती।सलमा के बगल में बैठती थी मुमताज बानो। मुमताज के सरकारी बस के चालक थे। उसकी आर्थिक दशा सलमा से अच्छी थी। इसलिए वह थोड़ा स्टाईल भी मारती थी।सलमा स्नेह की भूखी थी। मुमताज़ बानो थी तो खाते-पीते घर की, लेकिन उसके दिमाग में गोबर भरा हुआ था। हां, सलमा की तुलना में वह साफ-सुथरे कपड़े पहन कर आया करती थी।बाल करीने से काढ़े हुए रहते।उसके बदन पर मैल न होता और न ही गाल पर मच्छर काटने के निशानात! सलमा ठहरी अपने लाचार-बेज़ार अब्बू की बिटिया।अम्मी होतीं तो क्या उसके बाल यूं लटियाए रहते, दांत मैले रहते और चेहरा बेनूर होता!जब देखो तब सलमा अपने रूखे बालों को खबर-खबर खजुआते रहती।लड़कियां उससे दूर रहतीं कि कहीं उनके सिर में भी जूएं न पड़ जाएं।एक दिन जब गंगाराम सर ने गणित के लाभ-हानि वाले पाठ का एक सवाल उससे पूछा तो वह आदतन कुछ बता न पाई।गंगाराम सर ने छड़ी से मार-मार कर उसकी हथेली लाल कर दी।सलमा को उस मार के दर्द से कोई तकलीफ़ न हुई, लेकिन घर में पढ़ने के लिए थोड़ा भी वक्त न निकाल पाने की मजबूरी से उसे दुख हुआ।वह रोने लगी। फिर उसे अपनी अम्मी की याद आई। वह होतीं तो शायद ऐसे बुरे दिन न देखने होते। अम्मी उसका तनिक भी ख्याल रखतीं तो क्या वह ऐसी मैली-कुचैली दिखती।तब हो सकता है कि कक्षा के बच्चे और शिक्षक उससे नफ़रत न करते।वह भी घर में पढ़ती तो रोज़ाना की इस मार-डांट से बची तो रहा करती।और वह हिचकियां ले-लेकर रोने लगी। बगल में बैठी मुमताज़ नहीं जानती थी कि इस हालत में सलमा को कैसे चुप कराया जाए। सलमा टेसुए बहाती रहीं तो गंगाराम सर चिंतित हुए। वह पास आए और प्यार से उसके बालों पर हाथ फेरते हुए कहा--''छुट्टी होने पर तुम स्टाफ-रूम में आकर मुझसे मिलना।'' गंगाराम सर ने जो उसके सिर पर हाथ फेरा उससे उसे कुछ सांत्वना मिली। मुमताज़ ने उसके हाथ को अपने हाथ में लेकर सहलाया।सलमा की सुबकियां कम हुईं।छुट्टी होने पर बस्ता समेट सलमा कक्षा से बाहर निकली। उसके दिमाग में गंगाराम सर की बात घूम रही थी कि तुम स्टाफ-रूम में आकर मुझसे मिलो। सलमा के क़दम स्वत: स्टाफ-रूम की तरफ उठे।हेडमास्टर साहब के आफिस के बाहर चपरासन बैठी स्वेटर बुन रही थी। आफिस के बगल में लाईब्रेरी थी फिर उसके बाद स्टाफ-रूम। सलमा ने परदे की झिर्रियों से कमरे के अंदर ताका। गंगाराम सर बैठे हुए थे। जैसे वह सलमा का इंतज़ार कर रहे हों।सलमा परदा हटाकर खड़ी हो गई। गंगाराम सर ने उसे अंदर बुलाया और जब वह उनके पास पहुंची तो उसकी निगाहें झुकी रहीं।गंगाराम सर ने उससे कहा-''मेरी तरफ देखो, मैं तुम्हें मारता इसलिए नहीं कि मैं तुम्हारा दुश्मन हूं। मुझे हमेशा यही लगता है कि तुम्हें पढ़ना-लिखना चाहिए। लेकिन मैं तुम्हारी मजबूरी समझता हूं। तुम चिन्ता न करो। मैं तुम्हारे बाप को जानता हूं। बिचारा ग़रीब मजदूर है। चक्की में काम कर किसी तरह बच्चों का लालन-पालन करता है। तुम्हारे बाप से बात करूंगा कि वह तुम्हें मेरे घर पढ़ने भेज दिया करें। मैं तुम्हें अलग से पढ़ा दिया करूंगा। ऐसा पढ़ा दूंगा कि एक दम 'फर्स्ट-क्लास' पास हो जाओगी।'' सलमा चित्र-लिखित सी उनकी बात सुनती रही।फिर उन्हें नमस्कार कर कमरे से बाहर निकल आई।गंगाराम सर ने उससे कहा कि रविवार के दिन अपने घर का काम-काज निपटा कर सलमा उनके घर आ जाया करे। दुपहर में अपने आराम करने के समय पर वह उसे एक-डेढ़ घण्टे पढ़ा दिया करेंगे।सलमा ने घर आकर अब्बू को स्कूल की बात बताई। अंधे को क्या चाहिए, दो आंख!अब्बू गंगाराम सर को जानते थे। उन्होंने सलमा को इजाज़त दे दी। रविवार का दिन। गंगाराम सर के घर सलमा को पढ़ने जाना था।जल्दी-जल्दी उसने घर के काम-काज निपटाए।उसके बाद उसने सोचा कि अच्छे से साफ-सुथरा हो लेना चाहिए।इसलिए सलमा नहाने के लिए आंगन के कोने में बने गुसलखाने में चली गई। टाट-बोरे के टुकड़े, चटाई, बांस की खपच्चियां आदि से जोड़-तोड़ कर बनाया गया बिना छत का गुसलखाना। जिसके अंदर पत्थर की एक बड़ी पंचकोना चीप बिछी हुई थी।इतनी बड़ी पत्थर की चीप कि एक आदमी आसानी से बैठ कर नहा सके और कपड़े भी धो-फींच ले।चीप के पास ही, एक कोने पर आधा कटा ड्रम का टुकड़ा रखा हुआ था। उस ड्रम में सुबह-सुबह सलमा या फिर रूकैया बाहर चांपाकल से पानी लाकर भर दिया करती थीं। उसी से घर का निस्तार चलता। उसके बाद यदि उसमें पानी घटता तो तत्काल बाहर से पानी लाना पड़ता था।गुसलखाना के साथ वह धिरी हुई पर्देदार जगह पेशाब-घर का भी काम करती थी। मुसलमानों में पेशाब करने के बाद पानी इस्तेमाल करना ज़रूरी होता है, वरना जिस्म में नापाकी बनी रहती है। इसलिए ड्रम में पानी हमेशा उपलब्ध रहता है।अम्मी से बेटियों ने पाक-साफ रहना सीखा था। अम्मी कहा करती थीं कि हमेशा 'इस्तिंजे' से रहा करो, जाने अल्लाह-पाक कब और किन हालात में इंसान की रूह कब्ज़ कर ले!हां, महीने के उन ख़ास दिनों को छोड़कर जब किसी औरत को नापाक रहना ही पड़ता है।अम्मी बताया करती थीं कि इस नामुराद घर में उनकी शादी से पहले गुसुलखाना नहीं था। तेरे अब्बू और दादा-अब्बू बाहर खुले में नहाया करते थे। औरतों को नहाना होता तो चारपाईयों की ओट बनाकर अस्थाई गुसलखाना बना लिया जाता था। बड़ा अजीब लगता था उन्हें।अम्मी ने जब देखा कि ये लोग नहीं बदलेंगे, तब उन्होंने स्वयं टूटी-फूटी चीज़ें जोड़-जाड़ कर आंगन के कोने को गुसुलखाने की शक्ल दी थी। अम्मी हमेशा अपनी ससुराल को कोसा करतीं। अपने भाईयों और भौजाईयों की लापरवाहियों का रोना रोतीं, जिन्होंने उनकी शादी इन कंगालों में करके अपने सिर से बला टाली थी।कभी वह अपनी किस्मत को फूटा हुआ बतातीं। अल्लाह-तआला ने उनकी तकदीर इतनी बुरी क्यों लिखी, इस सवाल जवाब अम्मी हमेशा खुदा-वंद करीम से पूछती रहीं।सलमा की अम्मी बताया करती थीं कि उनके मां-बाप अच्छे खाते-पीते लोग थे। सन् 47 में विभाजन के समय उनके मां-बाप बांग्लादेश चले गए। अम्मी तब बच्ची थीं और बड़े मामू के पास ही रहती थीं। बड़े मामू कलकत्ता की जूट-मिल में मिस्त्री का काम करते थे। अच्छी आमदनी थी उनकी। खिदिरपुर की सीमा पर उन्होंने एक कट्ठा ज़मीन खरीद कर वहां मकान भी बना लिया था। अम्मी बतातीं कि उनके बड़े भाई बहुत रहमदिल इंसान थे लेकिन भाभी जैसे कड़वा-करैला। ऐसी ज़हर बुझी बात कहतीं कि बस कलेजा जल जाता। फिर भी दिन ठीक ही गुज़र रहे थे। तभी बड़े मामू को टीबी हो गई और उनके घर के हालात ख़राब हो गए। मुमानी के अत्याचार बढ़ने लगे तो अम्मी के छोटे भाई उन्हें अपने साथ बिलासपुर लेते आए। वह बिलासपुर में रेल्वे इंजिन चालक के पद पर कार्यरत थे।उन्होंने जैसे-तैसे अम्मी की शादी इब्राहीमपुरा में तय कर दी। तब अम्मी मात्र तेरह या चौदह बरस की थीं।बच्ची ही तो थीं, जब उनपर ज़िम्मेदारियों का बोझ आन पड़ा था।अम्मी को अपने पूरे माईके वालों से और अपने ससुराल वालों की ग़रीबी और असभ्यता से सख्त चिढ़ थी।इसीलिए अम्मी जब तक इस घर में रहीं बेगाना बन कर रहीं।उन्हें घर की किसी भी चीज़ से भावनात्मक लगाव न था। यहां तब कि अपनी बच्चियों से भी नहीं। एक दिन ऐसा भी आया कि घर के सभी सदस्यों को अचम्भित छोड़ कर अम्मी जाने कहां चली गईं।जाने क्या हो जाता है कि सलमा अपनी अम्मी को जितना भूलने की कोशिश करती है, अम्मी का प्रेत रह-रहकर उसे डराता रहता है। सलमा ने अक्सर चाहा कि गुसुलखाने में रखे ड्रम को वह कहीं फेंक आए या फिर उसे तोड़-फोड़ कर आंगन में बिखरा दिया जाए, लेकिन वह ऐसा कभी कर न सकी। अम्मी के ज़माने में ये ड्रम बहुत रूतबे वाला हुआ करता था। घरेलू-इस्तेमाल के लिए अब्बू जैसे-तैसे बाहर से पानी लाकर उस ड्रम में भरा करते थे, तब कहीं जाकर उन्हें हाजी जी की चक्की में डयूटी बजाने का हुक्म हुआ करता था। अब्बू अम्मी से डरते बहुत थे। सर्दियों में गुसलखाने के जर्जर पर्दे को कूद-फांद कर धूप की किरनें ड्रम पर पड़ती थीं। सुरैया चांपाकल से पानी लाकर उस ड्रम में डाल देती जो दुपहर होते-होते कुनकुना-गर्म हो जाता। सलमा नहाने के लिए सिर्फ समीज पहने हुए पत्थर की चीप पर बैठ गई और उसने सबसे पहले अपने पैरों की सफाई करनी चाही। एड़ि पर मैल की मोटी परत जम कर सख्त हो चुकी थी। बिना पत्थर से रगड़े मैल न छूटता।उसने मैल छुड़ाने वाले पत्थर के टुकड़े से एड़ियों का मैल निकाला। साबुन के नाम पर कपड़ा धोने वाला घोड़ा छाप साबुन था।उसने उसी से अपने सिर धोए।सिर से इतना मैल निकला कि पूरा गुसलखाना काला हो गया। वह चाहती थी कि सारे बदन की रगड़-रगड़ कर सफाई करे, लेकिन गुसलखाना बिना छत का था। उनके गुसलखाने से हाजी रफी की छत दिखलाई देती थी। यदि हाजी रफी की छत पर कोई आ जाए तो गुसलखाना बेपर्दा हो जाएगा।अपने बदन को खुद से छुपाते हुए उसने अच्छी तरह पूरे बदन पर साबुन मला। फिर दिल खोलकर नहाया। जब वह नहा कर फुर्सत पाई, तो गर्मी के कारण कुछ ही देर बाद बालों को छोड़ बदन का पानी सूख गया। कपड़े धोने के साबुन के कारण जिस्म की चमड़ी खुष्क हो गई। ऐसा लगने लगा जैसे चमड़ी में खिंचाव आ रहा हो। बदन खुजलाने लगा।जब उसने हाथ खुजलाया तो हाथ की चमड़ी पर सफेद लकीरें खिंच आईं।उसने तत्काल रसोई घर जाकर सरसों का तेल हथेलियों पर लेकर पूरे बदन पर लगाया, तब जाकर उसे राहत मिली।ईद में अब्बू ने मस्जिद-मार्केट से सलवार-सूट दिलवाया था। मेंहदी रंग का वह सूट सलमा पर खूब फबता था। उसने वही सूट निकाल कर पहन लिया।रूकैया और सुरैया उसे सजते देख रही थीं।उसने सुरैया को समझाया कि वह एक-डेढ़ घण्टे में आ जाएगी। वह टयूशन पढ़ने जा रही है। उसके पीछे वे दोनों शैतानी न करें। लड़ाई-झगड़ा न करें। रसोई की देगची में चावल-दाल बचा हुआ है। भूख लगे तो वही भकोस लेंगी। कहीं बाहर खेलने न जाएं और न ही किसी को घर में घुसने देंगी।इतना समझा, किताब-कापी लेकर सलमा गंगाराम सर के घर की तरफ निकल पड़ी। बस-स्टैंड के पीछे नदी की तरफ जाने वाले रास्ते में सेठ हजारीमल के नौकरों का आवास और गाय-भैंस वाली खटाल थी।नदी के किनारे की ज़मीन, जो कि निश्चित है कि सरकारी ही होगी। उस ज़मीन पर सेठ हजारीमल ने अवैध क़ब्ज़ा जमा कर लगभग बीस मकानों का एक बाड़ा बनाया हुआ था। दो-दो कमरे का मकान। पानी के लिए कुंआ और कुंआ के इर्द-गिर्द औरतों और मर्दों के नहाने के लिए अलग-अलग गुसलखाने। पैखाना के स्थान पर भगवान की बनाई नदी के किनारे का निर्जन इलाका। गंगाराम सर का मकान नदी के छोर पर था।फिर उसके बाद नदी की ढाल चालू होती थी। नदी नगर की विभाजन-रेखा है। नदी के एक तरफ जिन्दा नगर आबाद और नदी की दूसरी तरफ मुर्दा से गांव। कहते हैं कि नदियों के किनारे ही दुनिया की सभ्यताएं विकसित हुई हैं। आख़िर हों भी क्यों न! अब इसी नदी को ही ले लो। बस-स्टैंड बना तो नदी के तट पर कि यात्रियों, बस-चालकों, कण्डक्टरों आदि को निस्तार के लिए कहीं भटकना न पड़े। नदी के किनारे दैनिक-क्रिया से फ़ारिग भी हो लिए, कपड़े साफ कर लिए और नहा लिए। पूरा नगर ही नदी के साथ-साथ बल खाते हुए विस्तार पाया है। नदी आगे जाकर बड़ी नदी हसदेव से जा मिली है।वहां तक नगर का विस्तार है।धड़ाधड़ मकान बन रहे हैं।जो भी यहां एक बार आया यहीं का होकर रह गया। इसी कारण मारवाड़ियों, जैनियों, सिक्खों, इसाईयों और मुसलमानों के कई-कई पूजा-स्थल यहां बन गए हैं। मंदिर तो अनगिनत बन गए होंगे। जब सारे भगवानों के लिए अपने अलग-अलग, कई-कई मंदिर बन गए तो उसके बाद नगरवासियों ने शिरडी वाले साईं बाबा का मंदिर बनाना षुरू कर दिया है। एक और सांईराम भगवान हैं जिनका मंदिर प्रस्तावित है। मुसलमानों में धर्म और व्यवसाय के घाल-मेल को समझने वालों ने भी नगर के बाहरी इलाके में एक मज़ार का तसव्वुर कर लिया। अब वहां पर एक पक्की मज़ार है। हर साल वहां उर्स का मेला भरता है। नागपुर, बनारस जैसी जगहों से क़व्वाल बुलाए जाते हैं। ढेरों चादरें चढ़ती हैं।राम-लीला, यज्ञ, रास-लीला जैसे आयोजन बड़े धूम-धाम से किए जाते हैं। सेठ हजारीमल के बाड़ा और गंगाराम सर के मकान के बीच की खाली जगह पर एक भव्य शिव-मंदिर का निर्माण-कार्य चल रहा था।नदी के इस इलाके में सलमा बहुत कम आई थी। बचपन मे जब पानी की किल्लत होती थी, वह अम्मी के साथ इस नदी पर कपड़े धोने और नहाने आया करती थी। नदी आगे जाकर मुड़ गई है। जहां पर नदी मुड़ती है, नदी की धार मंद होती है उस जगह को 'दहरा' कहा जाता है।सलमा ने 'दहरा' का अर्थ ऐसी जगह से लिया जहां पानी कुछ गहरा हो। वाकई 'दहरा' पर पानी प्रचुर मात्रा में साल भर रहता है। 'दहरा' के किनारे ग्रेनाइटिक चट्टानें हैं।उन चट्टानों पर लोग कपड़े धोते हैं।सलमा को इस 'दहरे' पर नहाना बहुत अच्छा लगता था। हां, गर्मियों में जब वे नहा-धो कर घर वापस आतीं तो धूप सिर चढ़ आती थी और पूरा बदन पसीना-पसीना होकर दुबारा नहाने की मांग करता था।सलमा जिस समय गंगाराम सर के मकान पहुंची, आसमान की ऊंचाईयों पर सूरज दमक रहा था।मकान के दरवाज़े पर नेमप्लेट लगी थी।लिखा था-''गंगाराम, व्याख्याता'' सलमा थोड़ी देर रूकी रही, क्योंकि घर का दरवाज़ा अधखुला था।उसने अंदर झांका।पहला कमरा बैठकी की तरह का था, जिसमें चार प्लास्टिक की कुर्सियां और एक तख्त था। तख्त पर सलीके से गद्दा-तकिया बिछा था। थोड़ा और अंदर तक ध्यान से देखने पर उसने पाया कि अंदर वाले कमरे में गंगाराम सर कच्छा-बनियान पहने बैठे हैं। केरासिन तेल वाले प्रेशर-स्टोव के जलने की आवाज़ आ रही है।सलमा ने झिझकते हुए सांकल बजाई।गंगाराम सर 'हांजी' की आवाज़ निकालते बाहर आ गए।उनके हाथ पर आटा चिपका था। शायद आटा गूंथने की तैयारी कर रहे हो या फिर रोटी बना रहे हो।सलमा को सर की ये हालत देख हंसी आई लेकिन संकोंच के कारण वह हंसी नहीं। गंगाराम सर ने उसे अंदर आने को कहा। ''हें हें हें, का करूं, बच्चे हैं नहीं, सो खुदै रोटी पका रहा था।'' गंगाराम सर ने बातें बनाईं। सलमा से रहा न गया। उसने कहा कि सलमा के रहते सर रोटी बनाएं वह कैसे बर्दाश्त करेगी। इसलिए आप दूसरे काम निपटा लें तब तक सलमा रोटी बना देगी। गंगाराम सर ने कहा कि ये तो रोज़ाना का काम है। होटल का खाना बदन को 'सूट' नहीं करता इसलिए जैसा भी कच्चा-पक्का बनता है, बना लेते हैं।अंदर के कमरे में एक तरफ किचन थी।वाकई गंगाराम सर आटा गूंथने की तैयारी में थे। तभी तो स्टील की परात में आटा पड़ा था और जग में पानी।सलमा बैठ गई और आटा गूंथने लगी। गंगाराम सर उसके पास बैठ गए और सलमा को आटा गूंथते देखते रहे।सलमा ने आटा गूंथने के बाद आटे की छोटी-छोटी लोईयां बनाईं।गंगाराम सर उन लोईयों को बेलने लगे तो सलमा ने उनसे बेलन-चौकी छीन ली और कहा कि आप बैठ कर रोटी सेंक दें। सलमा रोटी बेलने लगी।गंगाराम सर तवे पर रोटी सेंकने लगे।सलमा को संकोच तो हो रहा था, लेकिन कक्षा में बुरी तरह पीटने वाले गंगाराम सर की इस दयनीय हालत से वह द्रवित हो गई थी। घर में कितने सीधे-सादे हैं गंगाराम सर, सलमा को यह अच्छा लग रहा था।दस-बारह रोटियां बनाईं उसने।फिर वह अंदर आंगन में आकर हाथ धोने लगी।उसने सोचा कि वक्त तो ऐसे ही गुज़र गया। पता नहीं कब सर पढ़ाएंगे और फिर उसे वापस घर भी तो लौटना है। सलमा हाथ धोकर बैठकी में आ गई और ज़मीन पर चटाई बिछाकर किताब खोल कर पढ़ने लगी।गंगाराम सर भी वहां चले आए।उनके हाथ में दो थालियां थीं।एक खुद के लिए और दूजी थाली सलमा के लिए।सलमा ने बताया कि वह तो खाना खाकर आ रही है।गंगाराम सर ने कहा-''का हुआ, जो खा कर आई हो। अरे, इहां का भी तो चख कर देखो...!'' सलमा को भूख तो लग आई थी, लेकिन संकोच के कारण वह निर्णय नहीं ले पा रही थी, कि खाना खाए या न खाए।देखा कि उसकी थाली में दो रोटियां हैं। उसने एक रोटी उठाकर गंगाराम सर की थाली में डाल दी और सकुचाते हुए रोटी के छोटे-छोटे कौर बनाने लगी।सर भी उसके पास चटाई पर बैठ कर रोटी खाने लगे। एक रोटी के तीन कौर बनाकर चपर-चपर की आवाज़ के साथ गंगाराम सर खाना खाने लगे। सलमा को चप-चप की आवाज़ से चिढ़ है।बहनों को तो वह टोक देती थी, लेकिन सर को कैसे मना करे। उसने किसी तरह रोटियां कंठ के नीचे उतारी और चुप-चाप बैठी रही।गंगाराम सर ने लगभग आठ रोटियां खाई होंगी फिर एक लोटा पानी पीकर उन्होंने बड़ी तेज़ डकार ली।सर ने थाली में ही हाथ धोया और सलमा से भी कहा कि वह थाली में हाथ धो ले।सलमा की अम्मी ने यही सब तो सिखाया था कि हाथ उस थाली में कभी न धोइए, जिसमें आपने खाना खाया हो। सलमा उठते हुए सर की जूठी थाली उठाने लगी तो सर ने उसका हाथ पकड़ लिया और कहा-''अरे, ये का कर रही हो। बाई आएगी तो बर्तन धोएगी।''सलमा ने थाली उठाकर हाथ में ले ली और आंगन में आ गई। एक तरफ बर्तन-कपड़े धोने के लिए जगह बनी थी।उसने जूठी थालियां वहीं रख दीं और थोड़े से पानी से हाथ धो लिए।खाना खाकर गंगाराम सर की तोंद उभर आई थी।वे चटाई पर बैठ कर एक डब्बे से तम्बाखू-चूना-सुपारी का गुटखा बनाने लगे।सलमा भी उनके पास बैठ गई और किताब खोलने लगी।खैनी खाकर गंगाराम सर थूकने के लिए बाहर निकले और फिर वापस आकर तखत पर पसर गए। फिर उन्होंने सलमा को तखत के पास वाली कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।सलमा चटाई पर ही बैठी रही तो सर फुर्ती से उठे और सलमा को उठा अपने पास तखत पर बिठा लिया।सलमा अचकचा गई।जो टीचर स्कूल में इतना सख्त हो कि पीट-पीट कर हाथ लाल कर दे, वह घर में इतना मुहब्बती होगा, सलमा को यकीन न हुआ।

रविवार, 1 अप्रैल 2012

pehchan : ansh

राजकमल  प्रकाशन से प्रकाशित  पहचान
पहचान का संकट  :  अनवर सुहैल


घण्टी की टनटनाहट के साथ प्लेटफार्म में हलचल मच गइ।
रात के ठिठुरते अंधियारे को चीरती पैसेंजर की सीटी नज़दीक आती गइ और चोपन-कटनी पैसेंजर ठीक साढ़े बारह बजे प्लेटफार्म पर आकर रूकी।
इक्का-दुक्का मुसाफिर गाड़ी से उतरे। पूरी गाड़ी अमूमन खाली थी।
यूनुस जल्दी से इंजन की तरफ भागा। वह इंजिन के पीछे वाली पहली बोगी में बैठना चाहता था। यदि खालू आते भी हैं तो इतनी दूर पहुंचने में उन्हे समय तो लगेगा ही
पहली बोगी में वह चढ़ गया।
दरवाज़े से लगी पहली सीट पर एक साधू महाराज लेटे थे।
अगली लार्इन में कोइ न था। हांए वहां अंधेरा ज़रूर था। वैसे भी यूनुस अंधेरी जगह खोज भी रहा था। उसने अपना बैग ऊपर वाली बर्थ पर फेंक दिया और ट्रेन से नीचे उतर आया।
वह चौकन्ना सा चारों तरफ देख रहा था।
अचानक उसके होश उड़ गए।
स्टेशन के प्रवेश.द्वार पर खालू नीले ओव्हर-कोट में नज़र आए। उनके साथ एक आदमी और था। वे लोग बड़ी फुर्ती से पहले गाड़ी के पिछले हिस्से की तरफ गए।
यूनुस तत्काल बोगी पर चढ़ गया और टॉयलेट में जा छिपा।
उसकी सांसें तेज़ चल रही थीं।
ट्रेन वहां ज्यादा देर रूकती नहीं थी।
तभी उसे लगा कि कोर्इ उसका नाम लेकर आवाज़ दे रहा है.यू...नू...स! यू...नू...स !
यूनुस टॉयलेट में दुबक कर बैठ गया।
गाड़ी की सीटी की आवाज़ आरइ और फिर गाड़ी चल पड़ी।
वह दम साधे दुबका रहा।
जब गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली, तब उसकी सांस में सांस आर्इ।
बैग कंधे पर टांगे हुए ही वह खड़े.खड़े मूतने लगा।
वाश.बेसिन के पानी से उंगलियों को धोते वक्त उसकी निगाहें आइने पर गइं।
आर्इने के दाहिनी तरफ स्केच पेन से स्त्री-पुरूष के गोपन-सम्बंधों को बयान करता एक बचकाना रेखांकन बना हुआ था।
यूनुस ने दिल बहलाने के लिए उस टॉयलेट की अन्य दीवारों पर निगाह दौड़ाइ।
दीवार में चारों तरफ उसी तरह के चित्र बने थे और साथ में अश्लील फिकरे भी दर्ज थे।
यूनुस टॉयलेट से बाहर निकलाए लेकिन वह चौकन्ना था।
ट्रेन की खिड़की से उसने बाहर झांका।
दो पहाड़ियों के बीच से गुज़र रही थी गाड़ी। आगे जाकर महदर्इया की रोशनी दिखार्इ देगी क्योंकि अगला स्टेशन महदइया है।
सिंगरौली कोयला क्षेत्र का आखिरी कोना महदइया यानी गोरबी ओपन-कास्ट खदान।
हो सकता है कि खालू ने खबर की हो तो महदइया स्टेशन में उनके मित्र उसे खोजने आए हुए हों।
पहाड़ियां समाप्त हुइं और रोशनी के कुमकुम जगमगाते नज़र आने लगे।
इसका मतलब स्टेशन क़रीब है।
महदर्इया स्टेशन के प्लेटफार्म में प्रवेश करते समय ट्रेन की गति धीमी हुइ तो यूनुस पुनरू एक टॉयलेट में जा घुसा। वह किसी तरह के ख़तरे का सामना नहीं करना चाहता था।
उसका अंदाज़ सही था।
इस प्लेटफार्म पर भी उसे अपने नाम की गूंज सुनाइ पड़ी। इसका मतलब ये सच था कि खालू ने यहां भी अपने दोस्तों को फोन कर दिया था।
वह टॉयलेट में दुबक कर बैठा रहा और पांच मिनट बाद ट्रेन सीटी बजा कर आगे बढ़ ली।
यूनुस ने राहत की सांस ली।
टॉयलेट से वह बाहर निकला।
उसने देखा कि साधू महाराज के पैर के पास एक स्त्री बैठी है। वह एक देहाती औरत थी। साधू महाराज के वह पांव दबा रही थी।
यूनुस ने उस सीट के सामने ऊपर वाली बर्थ पर अपना बैग रखा। फिर खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ कर शीशे के पार अंधेरे की दीवार को भेदने की बेकार सी कोशिश करने के बाद अपनी बर्थ पर उचक कर चढ़ गया।
उसे नींद आने लगी थी।
एयर.बैग से उसने गर्म चादर निकाली और उसे ओढ़ लिया। एयर.बैग अपने सिरहाने रख लिया ताकि चोरी का ख़तरा न रहे।
ट्रेन की लकड़ी की बेंच ठंडा रही थी। वैसे तो उसने गर्म कपड़े पर्याप्त मात्रा में पहन रखे थेए लेकिन ठंड तो ठंड ही थी। रात के एक.डेढ़ बजे की ठंड। उसका सामना के करने लिए औज़ार तो होने ही चाहिए।
वह उठ बैठा और अपनी जेब से सिगरेट निकाल ली। सिगरेट सुलगाते हुए साधू महाराज की तरफ उसकी निगाह गइ।
देहाती स्त्री बड़ी श्रद्धा से साधू महाराज के पैर दबा रही थी।
साधू महाराज यूनुस को सिगरेट सुलगाते देख रहे थे। दोनों की निगाहें मिलीं।
यूनुस ने महसूस किया कि वह भी धूम्रपान करना चाहता है।
यूनुस बर्थ से नीचे उतरा।
उसने महाराज की तरफ सिगरेट बढ़ाइ।
साधू महाराज खुश हुआ।
उसने सिगरेट सुलगाइ और गांजा की तरह उस सिगरेट के सुट्टे मार कर बाकी बची सिगरेट स्त्री को दे दी।
स्त्री प्रसन्न हुइ।
उसने सिगरेट को पहले माथे से लगाया फिर भोले बाबा का प्रसाद समझ उस सिगरेट को पीने लगी।
स्त्री के बाल लटियाए हुए थे। हो सकता है कि वह सधुआइन बनने की प्रक्रिया में हो। उसके माथे पर भभूत का एक बड़ा सा टीका लगा हुआ था।
उसकी आंखों में शर्मो.हया एकदम न थी। वह एक यंत्रचालित इकाइ सी लग रही थी। तमाम आडम्बर से निरपेक्षए साधू महाराज की सेवा में पूर्णतया समर्पित......
साधू महाराज ने पूछा."कौन  बिरादरी का है तू?"
यूनुस को मालूम है कि बाहर पूछे गए ऐसे प्रश्नों का क्या जवाब दिया जाए। जिससे माहौल न बिगड़े और काम भी चल जाए।
एक बार उसने सच बोलने की ग़ल्ती की थी, जिसके कारण उसे बेवजह तकलीफ़ उठानी पड़ी थी।
उसे कटनी में स्थित उस धर्मशाला का स्मरण हो आया, जहां वह एक रात रूकना चाहता था।
तब सिंगरौली के लिए चौबीस घण्टे में एक ट्रेन चला करती थी। कोतमा से वह कटनी जब पहुंचा तब तक सुबह दस बजे चोपन जाने वाल पैसेंजर गाड़ी छूट चुकी थी। अब दो रास्ते बचे थे। वापस कोतमा लौटा  जाए या फिर कटनी में ही रहकर चौबीस घण्टे बिताए जाएं। वैसे कटनी घूमने.फिरने लायक नगर तो है ही। कुछ सिनेमाघरों में "केवल वयस्कों के लिए" वाली पिक्चर चल रही थीं। ट्रेन में ही एक मित्र बना युवक उससे बोला कि चलो, स्टेशन के बाहर एक धर्मशाला है। मात्र दस रूपए में चौबीस घण्टे ठहरने की व्यवस्था। खाना इंसान कहीं भी खा लेगा। हांए एक ताला पास में होना चाहिए। धर्मशाला में ताला नहीं मिलता। जो भी कमरा मिले उसमे ग्राहक अपना ताला स्वयं लगाता है। यूनुस ने कहा था कि ताला खरीद लिया जाएगा।
वे लोग स्टेशन के बाहर निकले और सड़क के किनारे बैठे एक ताला.विक्रेता से यूनुस ने दस रूपए वाला एक सस्ता सा ताला खरीद लिया।
वे दोनों धर्मशाला पहुंचे।
पीली और गेरूआ मिट्टी से पुती हुइ एक पुरानी इमारत का बड़ा सा प्रवेश.द्वार। जिस के माथे पर अंकित था.
"जैन धर्मशाला"
वह अंदर घुसा।
अंदर द्वार से लगा हुआ प्रबंधक का कमरा था।
उस समय वहां कोइ भी न था।
सहयात्री ने कहा कि चलो, धर्मशाला देख तो लो।
वे दोनों अंदर की तरफ पहुंचे। दुतल्ला में चारों तरफ कमरे ही कमरे बने थे। बीच में एक उद्यान था। उद्यान के अंदर एक मंदिर। पानी का कुंआए हैंड.पम्पए और नल के कनेक्शन भी थे।
वे वापस आए।
प्रबंधक महोदय आ चुके थे।
वह एक कृशकाय वृद्ध थे।
चश्मे के पीछे से झांकती आंखें।
उन्होंने रजिस्टर खोल कर लिखना शुरू किया.
"नाम?"
सहयात्री ने बताया.
"कमल  गुप्ता."
."पिता का नाम?"
."श्री  विमल प्रसाद गुप्ता"
"कहा से आना हुआ और कटनी आने का उद्देश्य?"
."चिरीमिरी से कटनी आया रेडियो का सामान खरीदने।"
."ताला है न?"
कमल गुप्ता ने बताया."हाँ !"
प्रबंधक महोदय ने रजिस्टर में कमल से हस्ताक्षर करवाकर उसे कमरा नम्बर पांच आबंटित किया।
फिर उन्होंने यूनुस को सम्बोधित किया।
."नाम?"
."जी  मुहम्मद यूनुस"।
स्वाभाविक तौर पर यूनुस ने जवाब दिया।
प्रबंधक महोदय ने उसे घूर कर देखा। उनकी भृकुटि तन गइ थी। चेहरे पर तनाव के लक्षण साफ दिखलाइ देने लगे।
लम्बा.चौड़ा रजिस्टर बंद करते हुए बोले.
"ये  धर्मशाला सिर्फ हिन्दुओं के लिए है। तुम कहीं और जाकर ठहरो।"
सहयात्री कमल गुप्ता नहीं जानता था कि यूनुस मुसलमान है। सफ़र में बातचीत के दौरान नाम जानने की ज़रूरत उन दोनों को महसूस नहीं हुइ थी, शायद इसलिए वह भी उसे घूरने लगा।
यूनुस के हाथ में एक नया ताला था।
वह कभी प्रबंधक महोदय के दिमाग में लगे ताले को देखता और कभी अपने हाथ के उस ताले को, जिसे उसने कुछ देर पहले बाहर खरीदा था।
उसने अपनी ज़िन्दगी के व्यवहारिक-शास्त्र का एक और सबक हासिल किया था।
वह सबक था कि देश-काल-वातावरण देखकर अपनी असलियत ज़ाहिर करना। 
उसने जाने कितनी ग़ल्तियां करके, जाने कितने सबक याद किए थे।
सलीम भार्इ के पास ऐसी सहज.बुद्धि न थी, वरना वह ऐसी गल्तियां कभी न करता और गुजरात के क़त्ले.आम में यूं न मारा जाता।
इसीलिए जब साधू महाराज ने उसकी बिरादरी पूछी तो वह सचेत हुआ और तत्काल बताया. m हाराज मैं जात का कुम्हार हूं।
साधू महाराज के चेहरे पर सुकून छा गया।
चेहरा.मोहराए चाल-ढाल, कपड़ा-लत्ता और रंग-रूप से उसे कोइ नहीं कह सकता कि वह एक मुसलमान युवक है जब तक कि वह स्वयं ज़ाहिर न करे। उसे क्या ग़रज कि वह बैठे.बिठाए मुसीबत मोल ले।
वह इतना चालाक हो गया है कि लोगों के सामने अल्ला.कसम नहीं बोलता बल्कि भगवान.कसम या राम कसम बोलता है। अल्ला जाने क्या होगा की जगह भगवान जाने या फिर राम जाने कह कर काम चला लेता है।
अगर कोर्इ साधू या पुजारी प्रसाद देता है तो बाकायदा झुक कर बार्इं हथेली पर दाहिनी हथेली रखकर उस पर प्रसाद लेता है और उसे खाकर दोनों हाथ सिर पर फेरता है।  जबकि वही सलीम भार्इ हिन्दुओं से पूजा.पाठ आदि का प्रसाद लेता ही नहीं था। यदि गल्ती से प्रसाद ले भी लिया तो फिर उसे खाता नहीं था बल्कि चुपके से फेंक देता था।
यूनुस को यदि कोइ  माथे पर टीका लगाए तो वह बड़ी श्रद्धा.भाव प्रकट करते हुए बड़े प्रेम से टीका लगवाता और फिर उसे घण्टों न पोंछता।
ऐसी दशा में उस पर कोर्इ संदेह कैसे कर सकता है कि वह हिन्दू नहीं है।
वैसे भी अनावश्यक अपनी धर्म-जाति प्रकट कर परदेश में इंसान क्यों ख़तरा मोल ले।
बड़ा भाइ  सलीम अगर यूनुस की तरह सजग.सचेत रहता। खामखां मिंया-कट दाढ़ी. गोल टोपीए लम्बा कुर्ता और उठंगा पैजामा न धारण करता तो गुजरात में इस तरह नाहक न मारा जाता!
साधू महाराज ने यूनुस को आशीर्वाद दिया. तू  बड़ा भाग्यशाली है बच्चा! तेरे उन्नत ललाट बताते हैं कि पूर्वजन्म में तू एक पुण्यात्मा था। इस जीवन में तुझे थोड़ा कष्ट अवश्य होगा लेकिन अंत में विजय तेरी होगी। तेरी मनोकामना अवश्य पूरी होगी। यूनुस साधू महाराज के चेहरे को देख रहा था।
उसके चेहरे पर चेचक के दाग़ थे। दाढ़ी बेतरतीब बढ़ी हुर्इ थी। उसकी आयु होगी यही कोर्इ पचासेक साल। चेहरे पर काइंयापन की लकीरें।
साधू महाराज के आशीर्वाद से यूनुस को कुछ राहत मिली।
वह पुनरू अपनी जगह पर चला गया और बैग से लुंगी निकालकर उसे बर्थ पर बिछा दिया ताकि लकड़ी की बेंच की ठंडक से रीढ़ की हड्डी बची रहे।
बर्थ पर चढ़ कर उसने जूते उतारकर पंखे पर अटका दिए।
अब वह सोना चाहता था।
एक ऐसी नींद कि उसमें ख्वाब न हों।
एकदम चिन्तामुक्त सम्पूर्ण निद्रा!
जबकि यूनुस जानता है कि उसे नींद आसानी से नहीं आया करती। नींद बड़ी मान.मनौवल के बाद आया करती है।
उसने उल्टी तरफ करवट ले ली और सोने की कोशिश करने लगा।
खटर खट खट...खटर, खट...खट
ट्रेन पटरियों पर दौड़ रही थी।
सुबह छरू बजे तक ट्रेन कटनी पहुंच जाएगी। फिर सात.साढ़े सात बजे बिलासपुर वाली पैसेंजर मिलती है। उससे बिलासपुर तक पहुंचने के बाद आगे कोरबा के लिए मन पड़ेगा तो ट्रेन या बस पकड़ी जाएगी।
बिलासपुर में स्टेशन के बाहर मलकीते से मुलाकात हो जाएगी।
मलकीते के पापा का एक ढाबा कोतमा में हुआ करता था। सन् चौरासी के सिख.विरोधी दंगों में वह होटल उजड़ गया। सिख समाज में ऐसा डर बैठा कि आम हिन्दुस्तानी शहरी दिखने के लिए सिख लोगों ने अपने केश कटवा लिए थे। मलकीते तब बच्चा था। अपने सिर पर रूमाल के ज़रिए वह केश बांधा करता था। वह गोरा.नारा खूबसूरत लड़का था। यूनुस को याद है कि लड़के उसे चिढ़ाया करते थे कि मलकीते अपने सिर में अमरूद छुपा कर आया करता है।
उसके पापा एक रिश्तेदारों से मिलने रांची गए थे और इंदिरा.गांधी की हत्या हो गर्इ। वे उस समय सफर कर रहे थे। सुनते हैं कि सफर के दौरान ट्रेन में उन्हें मार दिया गया था।
उस कठिन समय में मलकीते ने अपने केश कटवा लिए थे।
मलकीते के बारे में पता चला था कि सन् चौरासी के बाद मलकीते की माली हालत खराब हो गइ थी।
तब मलकीते की मम्मी अपने भार्इ यानी मलकीते के मामा के पास बिलासपुर चली गइ थीं। वहीं मामा के होटल में मलकीते मदद करने लगा था।
स्टेशन के बाहर एक शाकाहारी और मांसाहारी होटल है. shere-पंजाब होटल।
यही तो पता है उसका।
इतने दिनों बाद मिलने पर जाने वह पहचाने या न पहचानेए लेकिन मलकीते एक नम्बर का यार था उसका!
यूनुस ने फुटपाथी विश्वविद्यालय की पढ़ाइ के बाद इतना अनुमान लगाना जान लिया था कि इस दुनिया में जीना है तो फिर खाली हाथ न बैठे कोर्इ। कुछ न कुछ काम करता रहे। तन्हा बैठ आंसू बहाने वालों के लिए इस नश्वर संसार में कोइ जगह नहीं।
अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इंसान को परिवर्तन.कामी होना चाहिए।
लकीर का फ़कीर आदमी का जीना मुश्किल है।
जैसा देस वैसा भेस...
कठिन से कठिन परिस्थिति में भी इंसान को घबराना नहीं चाहिए। कोइ न कोइ राह अवश्य निकल आएगी।
इसीलिए तो वह अम्मी.अब्बू घर.द्वार भाइ.बहिन रिश्ते.नाते आदि के मोह में फंसा नहीं रहा।
अपना रास्ता स्वयं चुनने की ललक ही तो है कि आज वह लगातार जलावतनी का दर्द झेल रहा है।
इसी उम्मीद में कि इस बार की छलांग से शायद अल्लाह की बनाइ इत्ती बड़ी कायनात में उसे भी कोइ स्वतंत्र पहचान

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

dahshatgard





ng”krxnZ

igys Vhoh ij mldh rLohjsa fn[kykbZ xbZa] fQj lekpkj&i=ksa us mlds ckjs esa ykursa&eykersa dh arks “kgj dk ekFkk BudkA
^^vjs HkbZ;k] x+t+c gks x;k! bZlk fe;ka dk CksVk eqlqvk llqjk vkradoknh fudy x;kA**
uxj ds lcls iqjkus /kqfu;k bZlk fe;ka dk csVk ewlk mQZ eqlqvk vkSj vkradoknh!
^^bZ llqjs fe;oka lCcs vkradcknh gksor gSa!** fclukFk feljk us rks ckdk;nk iwjh eqfLye d+kSe dks gh vkradoknh fl) dj fn;kA
uxj ls fudyus okys v[k+ckj ^f=“kwy* ds eq[ki`"B dk “kh"kZd Fkk ^uxj esa iuirk vkradokn*A lEiknd f=yksdpan us ewlk ds cgkus vius ^fo”ks"k laoknnkrk* ds ekQZr uxj] ns”k vkSj fQj vesfjdk dk izHkqRo Lohdkj dj jgh lewph nqfu;k esa QSys vkradokn dk rqjar&Qqjar tk;t+k fy;k FkkA
v[k+ckj ^f=“kwy* dk vkxzg Fkk fd ns”k Hkj esa QSys enjlksa dh ckjhdh ls tkap djkbZ tk,A ^ft+gkn* dk t+gj bUgha enjlksa ls /kkfeZd&f”k{kk dh vkM+ ysdj nh tk jgh gSA bUgsa vYila[;d dg&dg dj cgqla[;dksa ds lkFk bl ns”k esa lkSrsyk O;ogkj fd;k tk jgk gSA ;s yksx gekjh jktuhfrd ikfVZ;ksa dks Cysdesy djrs gSaA
dqN jktuhfrd ny LokFkZo”k bu rFkkdfFkd vYila[;dksa ds eu esa cgqla[;dksa dk Mj cSBk dj muds oksV [khap ysrs gSaA
ewlk dh [k+cj lqu&xqudj eSa Hkh dkQ+h vpafHkr FkkA
ewlk dks eSa O;fDrxr rkSj ij tkurk FkkA
tkurk Hkh D;ksa u] ewlk esjk lgikBh Fkk vkSj yaxksfV;k HkhA
,slk nksLr] ftls [kq”kh&[kq”kh dksbZ viuk gejkt+ cuk ysA
,slk ehr] ftlls ge viuk dqN ugha fNikrsA
ftlls vius fny dh dgds ge ruko&eqDr gks tkrs gSaaA
,d mez ds ckn balku bl rjg ds fj”rs [kks cSBrk gSA
vkxs tkdj ekuoh;&lEca/k] O;olkf;d] vkS|ksfxd] jktuhfrd ;k dwVuhfrd lEca/kksa ds uke ls iqdkjs tkrs gSaA rc gjsd lEca/k ds ihNs curs&fcxM+rs lehdj.k] fgr&vfgr] ykHk&gkfu vkfn iSekus vge jksy vnk djrs gSaaA
eqlqvk mQ+Z ewlk ,d eqlyeku ;qod FkkA
cpiu esa eSa eqlyekuksa ds ckjs esa ;gh tkurk Fkk fd ;s vNwr gksrs gSaA budk ^[kruk* fd;k tkrk gSA vkSjaxts+c tSls eqxy ckn”kkgksa ds vR;kpkjksa ls ?kcjkdj ;k fQj ykypo”k cgqrsjs fgUnw eqlyeku cu x,A
bfrgkl ds f”k{kd mik/;k; lj ,d lukruh v/ksM+ FksA os eqxy&dky dk bfrgkl i<+krs le; bruk m}sfyr gks tkrs fd eqxyksa dh lkjh x+fYr;ksa dk Js; d{kk esa mifLFkr bus&fxus eqlyeku yM+dksa ij Mky nsrs FksA
bfrgkl dk ihfj;M yaPk&czsd ds ckn gksrkA b/kj mik/;k; lj d{kk esa izos”k djrs m/kj Ldwy ds lehi fLFkr enhuk&efLtn ls nqigj dh uekt+ dh vt+ku xwatrhA&^^vYykgks vdcj----**
mik/;k; lj Nk=ksa dks crkrs*&^^cPpksa lquk rqeus efLtn ds eqYys dh ckax! bl ns”k ds eqlyeku vHkh rd eqxy ckn”kkg vdcj dh cM+kbZ djuk ugha NksM+s gSaA bu yksxksa ds eqag ls vius N=ifr f”kokth ;k egkjk.kk izrki dh cM+kbZ rqe dHkh ugha lqus gksxsA ;s yksx vkt Hkh vdcj&ckcj dh cM+kbZ xkrs gSaA**
tc rd vt+ku gksrh jgrh] mik/;k; lj cqjk lk eqag cuk, jgrs vkSj Dykl Bgkds ls Hkj tkrhA
eSa ,sls le; mu rhu lgikfB;ksa dks ns[kk djrk] ftudk vijk/k flQZ bruk jgrk fd os eqlyeku ?kjksa esa iSnk gq, gSaA
os ,d xqV cukdj vyx&Fkyx jgk djrs FksA
ml lewg dks d{kk ds ncax yM+dksa us uke fn;k Fkk&^dsth&xzqi*
^dsth* ;kuh fd ^dVqvk&xzqi*A
ewlk ml xzqi esa “kkfey ugha Fkk] “kk;n blhfy, eq>s fiz; FkkA
og d{kk ds cgqla[;d yM+dksa ds lkFk jgk djrk Fkk vkSj mUgha dh rjg ml xzqi ds YkM+dksa dks ^dsth* dgk djrk FkkA
ewlk ds ikl x+t+c dk ^lsal vkWQ+ áwej* FkkA ftl rjg ,d iatkch cMh csrdYyqQ+h ds lkFk vius gh Åij pqVdqys vkSj QfCr;ka lquk fy;k djrs gSa vkSj fcankl gal ysrs gSa] dqN ,slh gh fQ+rjr dk ekfyd Fkk ewlkA
ewlk ds vykok nwljs eqlyeku yM+ds tc is”kkc djrs rks fNi dj djrsA
tcfd ewlk gekjs lkFk VkW;ysV tk;k djrkA “kjkjrh rks og Fkk ghA t+:jr iM+us ij lcds lkeus gh isaV dh ft+Ik [kksydj ewrus yxrkA
ftu fnuksa ge dkslZ dh fdrkcksa esa ekFkk [kikrs Fks] ewlk ubZ&ubZ “kSrkfu;ka bZtkn djus esa yhu jgk djrkA
ewlk dh bUgh dkjLrkfu;ksa ds dkj.k d{kk ds reke cPps mls ^eqqlvk* dgdj iqdkjrsA
^eqlqvk* ;kuh fd pkykd pwgkA ,slk pwgk tks dqrjus dks lkjk ?kj dqrj tk, vkSj fdlh dks dkuksa&dku [k+cj u gksA “kjkjr esa cM+s&cM+ksa ds dku dqrjrk Fkk eqlqvkA
d{kk&f”k{+kd Fks feJk ljA
muds nks dke og fcuk mudh vkKk ds dj fn;k djrk FkkA
vOoy rks Ldwy ds ihNs dh >kfM+;ksa esa ?kqldj cs”kje dh gjh Vgfu;ka rksM+ ykuk vkSj nwtk feJk lj ds fy, [kSuh dk bart+ke djukA
eq>s rks ,slk yxrk gS fd eqlqvk cM+h de mez ls gh [kSuh oxSjk dk “kkSd Q+jek;k djrk FkkA
[kSuh rks [kSuh] yksxksa us mls pijklh jketh }kjk Qsadh xbZ v/ktyh chfM+;ka lqyxkdj ihrs Hkh ns[kk FkkA
rc Ldwyksa dks ikB”kkyk dgk tkrk FkkA bu ikB”kkykvksa esa Ldwy&;wuhQkeZ] Dykl&odZ] gkseodZ] ;wfuV&VsLV tSls csgwnk pksapys dgka Fks\
cl] frekgh] Nekgh ;k lkykuk ijh{kk gqvk djrh Fkha ml le;A
ftlesa vPNs&vPNs QUus[kka cPps Qsy gks tk;k djrs FksA
vfHkHkkodx.k f”k{kdksa dks ykblsal ns nsrs Fks fd os cPpksa dks lq/kkjus ds fy, pkgsa rks ihV&ihV dj v/kejk dj nsaA ekj ds Mj ls Hkwr Hkh Hkkxrs gSa] ge rks fQj cPps gh BgjsA frekgh&Nekgh ijh{kk esa Qsy gksus vkSj fiV&fiV dj csbT+T+kr gksus ds ckn gesa vD+y vk tkrh vkSj Fkd&gkj dj gesa fu.kZ; ysuk gh iM+rk fd vc i<+us vkSj jVus ds vykok dksbZ fodYi ugha cpkA urhtru lkykuk ijh{kk esa ge lEekutud uEcjksa ls ikl gks tk;k djrs FksA
rc vfHkHkkodksa dks vius cPpksa ls uCcs&fuUukucs izfr”kr vad dh vk”kk u gksrh FkhA
eqlqvk dk fnekx rst+ FkkA
lky Hkj og frdM+esa djrk ysfdu ijh{kk lehi vkus ij bruk t+:j i<+ ysrk fd xka/kh&fMoht+u ls ikl gks tkrkA
;fn og i<+us esa /;ku nsrk rks fuLlansg vPNs uEcj ykrkA



·       
eqlqvk vkradoknh cu x;kA
;s ,d ,slk lekpkj Fkk ftlus esjs fnekx ds tksM+&tksM+ fgykdj j[k fn, FksA
bruk feyulkj] gjfny&vtht+] lkekftd yM+dk ewlk fdlh vkradoknh laxBu ds fy, dke D;ksa djus yxk\
og esjs ?kj vk;k djrk FkkA
,d ?kVuk ,slh ?kVh fd mlds ckn mlus esjs ?kj pk;&uk”rk djuk NksM+ fn;k FkkA
gqvk ;s fd esjh eka ,d :f<+oknh] ikjEifjd /kkfeZd izo`fRr dh efgyk FkhaA og d+rbZ ugha pkgrh Fkha fd dksbZ fo/kehZ ;k fd vNwr&pekjksa ds lax muds cPps nksLrh djsaA muds lkFk mBs&cSBsaA mUgsa vius ?kj cqyk,a ;k muds ?kjksa esa tk,aA
firkth ds nQ~rjh lg;ksfx;ksa ds fy, ?kj esa vyx ls dqN crZu FksA ;s di&IysV] fxykl vkSj r”rfj;ka vyx j[kh tkrh FkhaA mUgsa eka u rks Nwrh Fkha] u ekatrh&/kksrh FkhaA twBs crZu xa/kkrs iM+s jgrs tc rc fd ukSdjkuh vkdj mUgsa u mBkrhA
,d ckj eqlqvk esjs ?kj vk;k rks esjs cqykus ij vanj pyk vk;kA
eka us pus dh ?kq?kuh cukbZ gqbZ FkhA
?kq?kuh eq>s cgqr ilan FkhA
eq>s eqlqvk ds lkFk rRdky [ksy ds eSnku tkuk FkkA
blfy, eSaus dgk fd uk”rk djds pyrs gSaA
eka us eq>ls eqlqvk dh t+kr iwNhA
eSaus crk;k fd fea;k cPpk gS eqlqvkA
eka dk fnekx [kjkc gks x;kA
D;k djrha] yM+ds dk nksLr gh BgjkA
mUgksaus ewlk ds fy, phuh feV~Vh dh r”rjh esa ?kq?kuh fHktokbZ vkSj esjs fy, LVhy ds IysV esaA
ewlk ds fy, phuh feV~Vh ds di esa pk; Fkh vkSj esjs fy, LVhy ds di esaA
ewlk ds fy, dkap ds rfud rM+ds fxykl esa ikuh fn;k vkSj eq>s LVhy ds fxykl esaA
ewlk dh iSuh fuxkgsa bl fHkUurk dks Hkkai xbZaA
mlus cgkuk fd;k fd mldk isV Bhd ugha gSA
og dqN Hkh u ysxkA
fQj tc ge ?kj ls ckgj fudy jgs Fks rks lkeus xyh esa f[kM+dh ds uhps ds ?kwjs ij dqRrksa ds lkeus ?kq?kuh dh r”rjh Qsadh xbZA
dqRrs vkil esa YkM+rs gq, ?kq?kuh [kkus ds fy, >iV iM+sA
ewlk us cgqr cqjk eglwl fd;k FkkA
mlus eq>ls lkQ dg fn;k fd ;fn og fdlh vkikr n”kk esa esjs ?kj vkrk Hkh gS rks dqN [kk,xk ;k fi,xk ughaaA ;fn esjh cgqr gh bPNk gks dqN mls f[kyk;k tk, rks gksVy esa D;k ugha feyrk gSA
oSls eSa tc Hkh eqlqvk ds ?kj tkrk rks mldh vEeh ds gkFkksa cuh fQjuh] lsobZa] gyqvk vkfn cM+s I;kj ls [kk;k djrk FkkA
ewlk eq>s cgqr ekurk FkkA
esjs fy, og tku fn;k djrk FkkA
og vkradoknh dSls cu x;k] esjh le> esa ugha vk jgk FkkA
og ,d galeq[k balku Fkk] ,dne ftUnkfnyA
dHkh nq[kh Hkh gksrk rks flQZ blh ckr ij fd yksx mls vius tSlk ,d vke balku ;k “kgjh D;ksa Lohdkj ugha djrs\ mls ns[kdj yksx D;ksa fgUnw&eqlyeku tSlh ckrsa djus yxrs gSaA
ewlk ;kuh eqlqvk i<+kbZ dk nq”eu Fkk] ysfdu uxj&eqgYys dh lkaLd`frd&/kkfeZd xfrfof/k;ksa esa c<+&Pk<+dj fgLlk fy;k djrk FkkA
ljLorh&iwtk] nqxkZ&iwtk] x.ks”k&iwtk] rqylh&t;arh] gksfydk&ngu gks ;k fQj n”kgjk esa jko.k&ngu ds dk;ZdzeA
eqgYys ds cPpksa us ,d laLFkk cukbZ Fkh&^^cky&Dyc**
cky&Dyc dk lcls lfdz; lnL; gqvk djrk Fkk ewlkA
de ls de iSls vkSj jn~nh dh pht+ksa ls og ,slh eap&lTtk djrk fd gekjs NksVs ls x.ks”k Hkxoku ,sls fn[krs T;ksa vius uUgs ls pwgs ij lokj gksdj og fgeky; dh pksfV;ksa ds chp ls jkLrk cukrs gq, pys vk jgs gksaA
:bZ vkSj ydM+h ds cqjkns ls og fgeky; dk vn~Hkqr lhu cuk fn;k djrk FkkA
n”kgjs esa jko.k ds iqrys Hkh mlh ds fnekx ls cuk, tkrsA
,d ckj jko.k dks ge yksxksa us “kksys ds xCcj&flax tSlk cuk fn;k FkkA
eqgYys ds tks”kh Hkb;k tks fd ,d cM+s v[kckj ds laoknnkrk Fks] mUgksaus gekjs xCcj&flax tSls jko.k ds ckjs esa ml le; lekpkj izdkf”kr djk;k FkkA
tks”kh Hkb;k vkj,l,l ds lfdz; dk;ZdrkZ FksA
eqlqvk dh lkaLd`frd dk;Zdzeksa esa Hkkxhnkjh ds dkj.k tks”kh Hkb;k mls ilan djrsA
eqlqvk Hkh mudk cgqr lEeku fd;k djrk FkkA
ns[krs&ns[krs og tks”kh Hkb;k dk eqjhn cu x;k FkkA
,d fnu mlus crk;k fd eSa Hkh jke&eafnj izkx.k esa yxus okyh vkj,l,l dh “kk[kk esa vk;k d:aA ogka tks”kh Hkb;k dbZ euksjatd [ksy f[kykrs gSaA
esjk ?kj vk;Z&lekth Fkk vkSj esjs cM+s Hkb;k tks fd tks”kh Hkb;k ds lgikBh Fks] og okeiaFkh fopkj/kkjk ds FksA
dkejsM iznhi vkSj tks”kh Hkb;k esa vDlj ?kaVksa cglsa gqvk djrhaA
tks”kh Hkb;k esjs HkkbZ dkejsM iznhi dks ^nxkckt+ dE;qfuLV* dgk djrsA ftUk yksxksa us Hkkjr&phu ;q) ds le; ns”k ds lkFk /kks[kk fd;k FkkA eSa Hkh tks”kh Hkb;k ds bl dFku dk leFkZd Fkk fd dE;wfuLV ns”knzksgh gksrs gSaA
^^cl ^,sfrgkfld&Hkwysa* fd;k djrs gSa dkejsM yksxA dksbZ leL;k vkbZ ugha fd yxsaxs phuh vkSj :lh fdrkcksa ds iUus iyVus fd ,slh n”kk esa ysfuu us D;k dgk Fkk] ekvks us D;k dgk] Lrkfyu us D;k fd;k vkSj fQj xckZpkso us rks bUgsa Mqcks gh fn;k!**
tks”kh Hkb;k ns”k&izse vkSj fgUnw&tkxj.k ds i{k/kj FkA ewlk muls cgqr izHkkfor FkkA og muds izHkko esa vkdj rqdcafn;ka Hkh djus yxk FkkA ftlesa ns”k&izse dh Hkkouk jgrh vkSj d”ehj dh j{kk ds fy, [kwu cgkus dh ckrsa gqvk djrh FkhaA tc og ikfdLrkfu;ksa dks Hkwu dj dPpk pck tkus okyh dfork i<+rk rks tks”kh Hkb;k xn&xn gks tkrs vkSj mBdj eqlqvk dks xys yxk ysrs FksA
ewlk us bu rqdcafn;ksa ds dkj.k Lo;a dks dfo eku fy;k Fkk vkSj ewlk Hkkjrh ds uke ls la?k dh if=dkvksa esa mldh dfork,a Nik djrh FkhaA
vkj,l,l dh “kk[kk esa ewlk dks jk"VªHkDr ukxfjd dk njtk feyk gqvk FkkA
“kk[kk esa ns”k ds reke eqlyeku ;qodksa ls blh rjg dh jk"VªHkfDr dh vk”kk dh tkrh FkhA ?keZ&fujis{krk dk fojks/k djrs gq, eqlyekuksa ls ;s vk”kk dh tkrh fd os lHkh la?k ds lkFk "tqM+dj jk"Vªoknh gks tk,a vkSj eq[;&/kkjk esa “kkfey gks tk,aA
ysfdu ewlk vf/kd fnuksa rd tks”kh HkbZ;k ds lEeksgu esa Qalk ugha jg ik;kA
;s e.My&de.My dh jktuhfr ds fnu FksA
iwjs ns”k esa vthc ekgkSy cu x;k FkkA
xjhch] Hkw[k] csdkjh] vijk/k] Hkz"Vkpkj vkfn Toyar eqn~ns jk"Vªªh;&iVy ls x+k;c gks pqds FksA vc yksxksa dks flQZ eafnj pkfg, Fkk ;k fQj efLtn---
ewlk v;ks/;k esa jke tUeHkwfe eafnj cuus ds i{k esa Fkk ysfdu ckcjh efLtn <gkdj ughaA
iwjk mRrj&Hkkjr esa ^d+le jke dh [kk,axs] eafnj ogha cuk,axs!* ^cPpk&cPpk jke dk] tUeHkwfe ds dke dk!* vkSj ^t;Jhjke!* tSls xxu&Hksnh ukjs xwat jgs FksA
,sls gh N% fnlEcj ckucs ds fnu ckcjh&efLtn <gk nh xbZA
iztkra= dk eqf[k;k nq[kh eqnzk esa Vslq, cgkrk jgk&^^esjs lkFk /kks[kk gqvk! Ekq>s jkT;&ljdkj us va/ksjs esa j[kk!**
ckcjh&efLtn D;k <gh] ewlk mnkl jgus yxk FkkA
ns”k ,d ckj fQj naxksa ds pisV esa vk x;kA
eqEcbZ esa nkmn ds xqxksZa us /kekdk fd;kA
eq>s ;kn gS fd lkr fnLEcj ckucs ds fnu] ewlk eq>s lkFk ysdj tks”kh Hkb;k ds vkokl ij ys x;kA
tks”kh Hkb;k “kkUr eqnzk esa cSBs FksA muds psgjs ij dke iwjk gksus dk larks"k Fkk vkSj Fkh ,d varghu yM+kbZ ds ,d NksVs ls iM+ko ds vkxs dh j.kuhfr r; djrh mRrstuk---
tks”kh Hkb;k ds lkeus ge dkQh nsj pqipki cSBs jgsA
eqlqvk ds psgjs ij vkdzks”ktU; fryfeykgV ns[k tks”kh Hkb;k us pqIih rksM+h&^^esjs ikl iDdh [k+cj gS fd la?k ds yksxksa dks] ;gka rd fd cM+s yhMjksa dks Hkh bl ckr dh tkudkjh ugha Fkh fd <kapk fxjk fn;k tk,xkA**
ewlk [kkeks”k cqr cuk cSBk jgkA
fQj og mB [kM+k gqvkA
eq>ls dgk&^^pyks!**
ge yD[kh dh pk; xqeVh esa vk cSBsA
cl&LVsaM esa yD[kh dh pk;&xqeVh FkhA
yD[kh gekjk lgikBh Fkk] ysfdu cki ds vle; ej tkus ds ckn og viuh i<+kbZ t+kjh u j[k ik;k vkSj iSr`d&nqdku lEHkkyus yxkA
yD[kh pk; cuk jgk FkkA
ewlk mls pk; cukrs cqr cuk rkd jgk FkkA
mlds ckn ewlk esa vtc ifjorZu gqvkA
ge ml le; ch, iwoZ ds Nk= FksA
vc ewlk esjs cM+s HkkbZ dkejsM iznhi dh cSBdh vVsaM djus yxk FkkA
iznhi HkkbZ ls og ns”k&nqfu;k dh jktuhfr vkSj vU; eqn~nksa ij ?k.Vksa cfr;krk jgrkA
tc og esjs lkFk Vgyrk rks dbZ rjg ds iz”uksa ls tw>rk jgrk&^^;kj HkkbZ---!**
^;kj HkkbZ!* ewlk dk rfd;k&dyke FkkA
^^ekuk fd os yksx Qklhoknh gSa] fo/oald gSaA os viuh euekuh dj fy;k djrs gSaA ,sls [krjukd le; esa gekjs ;s okeiaFkh dkejsM HkkbZ dksbZ ^,D”ku* u djds flQZ c;kuckth djrs gSaA ;s dkejsM ^xzkl&:V ysoy* ij ihfM+rksa dh enn u dj flQZ fojks/k&izn”kZu dk dkSu lk rjhdk vf[r;kj djrs gSa] esjh dqN le> esa ugha vkRkkA fdlh ?kVuk ds ckjs esa viuh jk; izdV djus ls iwoZ ;s dkejsM ,d&nks fnu rd can dejs esa xgu&ea=.kk djrs gSaA fQj tc fLFkfr fu;a=.k ls ckgj gks tkrh gS] rc mudk c;ku vkrk gS fd ;s ,d nqHkkZX;iw.kZ ckr gS vkSj ikVhZ bldh fuank djrh gSA ,sls esa rqe bu yksxkas ls D;k mEehn djksxs\ bl ns”k ds eqlyeku vkf[kj tk,a rks tk,a dgka\**
eSa mls le>krk fd rqe ukgd viuk fnekx [kjkc fd, jgrs gksA
;s lc lRrk ds xfy;kjksa dh jktuhfr gSA
lkjh nqfu;k ns[krs&ns[krs vejhdk dh xqyke gqbZ tk jgh gS vkSj gekjk ns”k vHkh Hkh ogh fgUnw&eqfLye leL;k ls nks&pkj gSA
ysfdu ewlk esjh ckr ls lger u gksrkA
og ph[k iM+rk&^^;kj HkkbZ! Rksjs lkFk ;s izkCye ugha gS fd rq>s [kqn dks ns”k&HkDr fl) djus dks dksbZ ugha dgrkA ge eqlyekuksa dks bl ns”k esa ges”kk ls “kd dh fuxkg ls ns[kk tkrk gSA
gesa ikfdLrku&ijLr le>k tkrk gSA gels ges”kk ns”k&HkfDr dk lcwr ekaxk tkrk gSA rqe ugha le>ksxs gekjh O;Fkk!**
tYn gh ewlk dk dkejsM iznhi ls vkSj Hkkjrh; okeiaFkh jktuhfr ls eksgHkax gks x;kA


·       
ge nksuksa us lkFk&lkFk ch, fd;kA
mldk vad&izfr”kr dkQh de FkkA cl ;wa le>ks fd xka/kh&fMoht+u ls ikl gqvk FkkA ewlk dkQh vkRedsafnzr gks x;k Fkk vkSj mlus viuh i<+kbZ dks fojke nsdj vius vCcw dh nqdku lEHkkyus dk fu.kZ; fy;k FkkA
esjs firk us eq>s tcyiqj ih,llh dh dksfpax djus ds fy, Hkst fn;k vkSj fQj eSa dSfj;j ds fy, ;wa nhokuk cuk fd eq>s nhu&nqfu;k dk gks”k u jgkA
bl chp tc Hkh eSa ?kj vkrk rks ?kwers&Vgyrs bZlk&fea;k dh jtkbZ&xn~ns dh nqdku ij vkdj cSBrkA
gekjs x`g&uxj esa mu fnuksa rglhy ls ftYkk cukus dh jktuhfr xekZbZ gqbZ FkhA
fur&ubZ vk”kadkvksa] vQ+okgksa] cnyrs jktuhfrd lehdj.k ls Hkjiwj Fkk ifjos”k!
vklikl dh dks;yk [knkuksa ds dkj.k ;s ,d O;olkf;d dLck gSA /kUk&/kkU; ls ifjiww.kZA orZeku vko”;drkvksa dh uohure oLrq,a ;gka ckt+kj esa miyC/k gSaA
blh rjg ns”k ds izeq[k fopkj/kkjkvksa dk izfrfuf/kRo djus okyh reke jktuhfrd ikfVZ;ksa dh “kk[kk,a bl uxj esa gSaA xka/kh&usg:] bafnjk&jktho] lksfu;k&jkgqy okyh dkaxzsl dk ;gka opZLo gSA iqjkus odhyksa vkSj dqN cqf)thfo;ksa esa yksfg;kokn ds ok;jl ut+j vkrs gSaA vlarq"V dkaxzslh xqV jkdkaik esa tkrk fn[krk gSA nfyrksa vkSj eqfLyeksa dh NksVh tkfr;ksa ds chp dka”kh&ek;korh czk.M clik] mRrj&izns”k ls b/kj vk cls ;knoksa vkSj iVsyksa ds chp eqyk;e okyh lik] cgqla[;d ukStokuksa esa ckyk lkgsc okyh f”kolsuk] dfV;kj okyh ctjax&ny] fla?ky okyh fofgi vkSj cfu;k&ckeuksa ds chp vMok.kh&vVy dh chtsih tSlh ikfVZ;kas dk vfLrRo lkQ fn[kykbZ nsrk gSA
igys&igy bl uxj esa ,d gh eafnj Fkk] nsoh&eka dk eafnjA fQj tc ;gka ekjokM+h vkdj cls rc uxj ds e/; esa HkO; ^jke&eafnj* cuk] ftlds izkax.k esa lqcg&”kke “kk[kk,a yxus yxhaA
igys ;gka ,d NksVs dejs esa efLtn cuh] fQj ns[krs&ns[krs bl uxj esa rhu efLtnsa] nks bZnxkg] ,d dczLrku] ,d et+kj cu xbZA
vkt uxj esa rhu ppZ] nks xq:}kjs] lSdM+ksa eafnj] nks flusek&gkWy] ikap isVªksy&iEi] vkB&nl uflZax&gkse] ntZuksa nok dh nqdkusa gSaA
igys tgka flQZ ,d tuin ikB”kkyk Fkh] vc mlh uxj esa dbZ ljdkjh Ldwy] vaxzsth ek/;e dh dbZ futh f”k{kk&nqdkusa] vatqeu Ldwy] fe”kujh Ldwy vkSj nks ljLorh f”k{kk&eafnj ds Ldwy [kpk[kp py jgs gSaaA
vkfFkZd mUufr ds lkFk /keZ] vkLFkk] fopkj] vkn”kZ] lEosnuk vkSj f”k{kk dk O;olk;hdj.k fdl rsth ls gksrk gS] bldh izR;{k felky ;gka ns[kh tk ldrh gSA

·       
eqlqvk vDlj vius jtkbZ&xn~ns okyh nqdku esa fey tkrkA
eqlqvk us dbZ txg ukSdjh ds iz;kl fd,A
p;u&ijh{kkvksa esa og ikl u gks ikrkA ukSdjh u yxs rks >V yksx dg nsrs gSa fd Hkb;k fcjknjhokn] izns”kokn] tkfrokn gks ;k fd VsaV esa iSlk---ukSdjh ikuk lcds cwrs dh ckr ughaA
bZlk fea;k dgrs gSa fd ^ehe* dks ukSdjh dgka\
eqYd esa eqwlyekuksa ls Hksn&Hkko fd;k tkrk gSA rHkh rks viuk eqqlqvk csdkj gSA
eqlqvk vius vCck dh ckr gal dj Vky tkrkA dgrk fd ukSdjh ls dgha vPNk gS fd vius vCck dh nqdku esa ekfyd cu dj cSBk tk,A
fQj eqqlqvk nqdku lEHkkyrs&lEHkkyrs iDdk dkjksckjh vkneh cu x;k FkkA
NBs&Nekgs eSa uxj vkrk vkSj eqlqvk esa gks jgh rCnhfy;ka ns[kk djrkA
Ikgys og uekt+sa fu;e ls u i<+rk FkkA dHkh&dHkh rks tqek dh uekt+ Hkh mlls NwV tkrh FkhA ysfdu b/kj ikap VkbZe uekt+ ikcanh ls vnk djus yxk FkkA
,d ckj vk;k rks eSaus ns[kk fd xn~nh ij eqlqvk dh txg fcuk ewaN ds yEch dkyh nk<+h okyk dksbZ ;qod cSBk gqvk gSA ftlds flj ij nqiYyh Vksih [kidh gqbZ gSA eSa mlls iwNrk fd HkkbZ ;gka rks bZlk fe;ka dh nqdku gqvk djrh FkhA
ysfdu ml nk<+hnkj ;qod us tc eq>s ns[k eqLdqjkdj cSBus dk b”kkjk fd;k rks eSaus igpkuk fd ;s rks viuk ewlk gSA flj ij xksy nqiYyh Vksih] ?kqVuksa rd yEch deht+ vkSj Vsguqvksa ds Åij mBk iStkek mldh igpku cu x,A
,dne rkfyckuh fn[kus yxk Fkk LlkykA
og vc eq>ls ckrsa djrk rks vpkud vkdzked gks tkrkA
eq>s fgUnw cgqla[;d fcjknjh dk uqekbUnk ekudj eq>ij tqckuh geys fd;k djrkA
dgrk&^^ckcjh efLtn fxjkus ds ckn uxj ds nqdkunkj vkSj xzkgdksa dh ekufldrk esa Qkad fn[kykbZ nsus yxh gSA ,sls le; esa le>nkj&l;kus tkus D;ksa pqi gSa\ vc fgUnw xzkgd eqlyeku nqdkuksa ls lkeku [kjhnus esa ijgst+ djrk gSA rqEgsa ekywe fd igys xks”r dh nqdkusa flQZ eqlyekuksa dh FkhaA ysfdu vc mu yksxksa us gekjh nqdkuksa ls xks”r [kjhnuk can dj fn;k gSA le>s ;kj HkkbZ! xyh ds nwljh rjQ muds vknfe;ksa us ^>Vds* okyh xks”r dh nqdkusa [kksy yh gSaA**
eSaus mls le>k;k fd ,slk blfy, ugha gS fd eqlyekuksa dks lrkuk gSA uxj dh vkcknh c<+ xbZ gSA xks”r dh nqdkusa de Fkha] blfy, xzkgdksa dks fnDdr gksrh FkhA T;knk nqdkusa jgsaxh rks ukxfjdksa dks lqfo/kk gksrh gSA**
ewlk viuh ckr ij vM+k jgk&^^eqlyeku xzkgd dks >d ekj dj fgUnqvksa dh nqdku tkuk iM+rk gSA D;ksafd ;kj HkkbZ! lksuk&pkanh] feBkbZ;ka] fdjkuk] diM+k] nokbZ vkSj feBkbZ;ksa dh nqdkusa rks flQZ muds gh ikl gSA gekjs ikl D;k gS\ cl] ;gh nthZ] /kqfu;k] isaVj] dkjisaVj] dlkbZ] eksVj&xkM+h ejEer dh nqdkusaA ftuesa gkM+&rksM+ esgur ds vykok vkenuh fdruh de gksrh gSA**
eq>s yxk fd ewlk dk tSls dksbZ ^czsu&ok”k* gqvk gSA
^^rqe flDds dk ,d gh igyw D;ksa ns[krs gks ewlkA D;k ns”k ds reke fgUnqvksa dks ljdkj us ukSdjh ns j[kh gS\ D;k Hkw[k] chekjh] csdkjh ls fgUnw ijs”kku ugha gS\**
og esjh lqurk dgka gS] cl viuh gh isys jgrk gS&^^Hkw[k] xjhch] chekjh ls ;fn eqlyeku ejrs rks eq>s fQ+dz u gksrh] ysfdu bu naxksa es iz”kklu&”kklu }kjk lqfu;ksftr rjhds ls eqlyekuksa dks VkjxsV cukdj rckg djus ij rqEgkjh D;k jk; gS\**
eSa crkrk fd eqlyekuksa dh nqnZ”kk dk dkj.k vf”k{kk] fu/kZurk vkSj “kkg&[kphZ dh vknrA ;fn ,d eqlyeku ipkl :Ik, izfrfnu Hkh dekrk gS rks pkgrk gS fd mldh jlksbZ esa xks”r ;k vaMk t+:j cusA og viuh jlksbZ dh rqyuk uokcksa&”kga”kkgksa ds ckophZ[kkus ls djrk gSA Hkys gh mlds cPps uax&/kM+ax fcuk diM+s&yRrs ds ?kwesA muds cPps fdrkc] Ldwy&Qhl vkSj ;wuhQkEkZ ds vHkko esa i<+&fy[k ugha ikrs gSa vkSj de mez esa gh fefL=;kas] nftZ;ksa] isaVjksa ds “kkfxnZ cu tkrs gSaA yM+fd;ka de mez esa C;kg fn, tkus ds dkj.k jDrkYirk] Vhoh vkSj vU; vlk/; jksxksa ihfM+r gks tkrh gSaA gkjh&chekjh dh n”kk esa esfMdy tkap u djkdj fea;k HkkbZ >kM+&Qwad] xaMk&rkoht+] eUur&eukSfr;ksa ds pDdj esa cckZn gks tkrk gSA
esjs rdksZaa dks lqudj eqlqvk vkSj fryfeyk tkrk vkSj eq>s ?kksj nf{k.kiaFkh djkj nsrkA
eSa nks&pkj fnuksa ds fy, ?kj vkrk Fkk lks eqlqvk ls T;knk ekFkkiPph u dj] mldh gka esa gka feykdj fudy ysrk FkkA
xks/kjk&dk.M ds ckn ls rks og fof{kIr gksus dh gn rd vkdzked gks x;k FkkA
lquus esa vk;k fd mlds ,d [kkyw] tks fd xqtjkr dh ,d csdjh esa dke djrs Fks] ^izfrfdz;k* ds uke ij mUgsa ftUnk tyk fn;k x;k FkkA
eSa mlds ikl vQ+lksl izdV djus x;k Fkk] D;ksafd fiNys ekg bZlk fea;k dh ekSr dh [k+cj LFkkuh; lekpkj i= esa ns[kh FkhA bZlk fea;k ,d xq.koku] feyulkj vkSj oruijLr balku FksA
mlus tc xks/kjk ds ckn ds xqtjkr esa tks fgalk gqbZ mlds fy, ns”k ds reke fgUnqvksa dks ftEesnkj Bgjk;k rks eq>ls jgk u x;kA
eSaus viuk i{k j[kk rks og nqO;Zogkj dh lhek ikj djus yxkA
eq>s D;k irk Fkk fd mlds vUnj iuius okyk ;s vlarks"k ,d fnu Tokykeq[kh cu tk,xkA


·       
fQj tc eSa vius x`g&uxj vk;k rks vknru ewlk dh nqdku dh rjQ pyk x;kA
ogka irk pyk fd ewlk vius vCck bZlk fea;k dh nqdku dk lkjk lkeku ,d nwljs /kqfu;k dks cspdj uxj NksM+dj dgha pyk x;k gSA
eSaus vius cM+s HkkbZ dkejsM iznhi ls tc mlds ckjs esa iwNk rks mUgksaus crk;k fd xqtjkr&dk.M ds ckn ewlk cny x;k FkkA mlds vanj rdZ&”kfDr vkSj /kS;Z FkksM+ Hkh “ks"k ugha cpk FkkA
,d fnu og ?kj vkdj dkejsM iznhi ls Hkh >xM+ iM+k Fkk fd dSls fo”okl d:a fd vki Hkh naxkbZ;ksa ds lkFk ugha Fks\ D;k xqtjkr esa /keZ&fujis{k] xSj&lkEiznkf;d vkneh ,d Hkh ugha cpk\ dgka x, vkids dSMj ds yksx tks xqtjkr esa Qqy&VkbZej gSa vkSj tks pkgrs rks D;k fLFkfr dks FkksM+k Hkh lEHkky ugha ikrs\
mlds ckn eSa ewlk mQZ eqlqvk dks Hkwy gh x;k Fkk fd vpkud ,d fnu----


·       
esjs lkeus iM+k Fkk ^f=“kwy* v[k+ckj dk eq[ki`"BA
dOgj&LVksjh ds lkFk eksgEen ewlk mQZ eqlqvk dh rLohjA
eq>s yxk fd lkFk gh dgha lEiknd dk [k.Mu u Nik gks fd v[k+ckj esa tks rLohj Nih gS] og x+yr Ni xbZ gSA
ysfdu esjh lksp lp u gks ldhA
og rLohj esjs cky&l[kk eqlqvk dh gh FkhA
D;k chr jgh gksxh mlds ejgwe vCck bZlk fea;k dh :g ijA
Ekhykn&”kjhQ+ dh egfQ+yksa dh “kku gqvk djrs Fks bZlk fea;kA
bZlk fea;k iSx+Ecj gt+jr eqgEen dh “kku esa ^ukfr;k&dyke* cgqr ehBh vkokt+ vkSj rjUuqe ds lkFk is”k djrs fd lquus okyksa dk fny ckx+&ckx+ gks tkrk FkkA
^^crgk ds tkus okys esjk lyke ys tk
 njckjs&eqLrQ+k esa  esjk Ik;ke  ys tk**
gka] tc og Hkkoukvksa esa cgdj lqj dh leanj esa xksrs yxk jgs gksrs rks mudk psgjk t+:j dqN fod`r lk gks tkrk FkkA
dkaxzlh t+ekus es Lora=rk&fnol lekjksM esa fot;&LrEHk pkSd ij >.Mk&jksg.k dk dk;Zdze gksrk FkkA fot;&LrEHk pkSd esa] Ldwyksa ds cPps] izHkkr&Qsjh ds ckn vk tkrs vkSj uxj ds x.kekU; ukxfjdksa dh mifLFkfr esa ogka >.Mkjksg.k dh dk;Zdze lEiUu gksrkA
tkus dc ls ml dk;Zdze esa bZlk fea;k ds ns”k&HkfDr iw.kZ xhr t+:j j[kk tkrkA
bZlk fea;k dk fiz; xhr Fkk&^^orj dh jkg esa oru ds ukStoka “kghn gksA!**
tc bZlk fea;k dh nnZ ls ycjst+ vkokt+ fQ+tka esa xwatrh rks lquus okys ns”k&izse dh Hkkouk ls rM+Ik mBrs&
                  ^^igkM+  rd  Hkh  dkaius  yxs rsjs tquwu ls
                   rw bad+ykc ft+Unkckn fy[k ns vius [kwu ls
                   peu ds okLrs peu ds ckxcka ““kghn gks
                   oru dh jkg esa oru ds ukStoka “kghn gksA**
bZlk fea;k bl volj ij viuh csrjrhc f[kpM+h nk<+h dks rjk”k dj vk;k djrsA
fcuk ewaN vkSj fea;k&dV nk<+h esa bZlk fea;k dk psgjk cM+k et+kfd;k ut+j vkrkA
ge rc cPps gh rks FksA
xhr ds “kCnksa dks vfHku; ds lkFk vFkZ dk tkek igukus dk iz;kl djrs bZlk fea;k dk psgjk fod`r gqvk ugha fd ge vdkj.k isV idM+dj galus yxrs FksA
dHkh&dHkh eqlqvk dk ewM Bhd fn[krk rks Hkksyk] bZlk fea;k ds psgjs dh ud+y djrs gq, fHk[kkfj;ksa ds ls vankt+ esa gkFk QSykdj ,d xhr xk;k djrk&^^vkSykn okyksa Qwyks&Qyks
                     Hkw[ks x+jhc dh ;s gh nqvk gS---!**
Ikwjh d{kk ml le; gal iM+rhA
,sls le; eqlqvk] Hkksyk dks eka&cfgu dh xkfy;ka cdrk mls nkSM+k&nkSM+kdj ihVk djrkA
fQj tc ljdkjsa cnyhaA xka/kh Vksih dh txg Hkxok xeNs gok esa ygjk, rc bZlk fea;k ls ^oUns&ekrje* xk;u dh Q+jekbZ”k dh xbZA
bZlk fea;k ^oans&ekrje* xk rks ysrs Fks] ysfdu mudk fgUnh mPpkj.k mruk nq:Lr u FkkA lks mudh txg fd”ku HkS;kth us ys yh tks fd jkeyhyk esa Hktu xkrs FksA
,sls ns”k&HkDr] xaxk&tequh laLd`fr ds okgd bZlk fea;k dk uwjs&ut+j] y[+rs&ftxj] ,d ng”krxnZ dSls cuk---
;s ,d fjlpZ dk fo"k; gSA


·       
esjs lkeus f=“kwy v[k+ckj gS] ftlesa ewlk vkradoknh dh rLohj gSA
?kuh dkyh nk<+h ds chp mldk psgjk rkfyckfu;ksa dh ;kn fnyk jgk gSA
esjk yaxksfV;k ;kj ewlk ,d ng”krxnZ dSls cuk] eSa D;k dHkh tku ikÅaxk\

शनिवार, 17 सितंबर 2011

नीला हाथी

कहानी नीला हाथी अनवर सुहैल ऽ कम्पनी के काम से मुझे बिलासपुर जाना था। मेरे फोरमेन खेलावन ने बताया कि यदि आप बाई-रोड जा रहे हैं तो कटघोरा के पास एक स्थान है वहां ज़रूर जाएं। मेन रोड से एक किलोमीटर पहले बाई तरफ जो सड़क निकली है, उस पर बस मुश्किल से दो किलोमीटर पर एक मज़ार है। वह मज़ार तो मुसलमानों का है लेकिन वहां एक हिन्दू अहीर को पीर बाबा की सवारी आती है। ये सवारी आती है शुक्रवार को, इसलिए प्रत्येक शुक्रवार वहां मेला सा लगता है। अहीर पर पीर बाबा सवार होते हैं और लोगों की जिज्ञासाओं का जवाब देते हैं। मैंने खेलावन फोरमेन से कहा-‘‘अपने देश की यही तो विशेषता है, नेता जात-पात के नाम पर लोगों को भड़काते हैं और जनता है कि देखो कैसे घुली-मिली है।’’ खेलावन फोरमेन मेरी बात सुन कर खुश हुआ, बोला-‘‘साहब, पिछली दफा मैं वहां गया तो जानते हैं बड़ा चमत्कार हुआ। जैसे ही मैं वहां पहुंचा, अहीर पर पीर बाबा की सवारी आई हुई थी। भीड़ बहुत थी। मैंने सोचा कि इतनी भीड़ में दर्शन न हो पाएगा। लेकिन तभी पीर बाबा की सवारी बोली कि देखो तो कोतमा से कौन आया है? लोगों ने एक-दूसरे की तरफ देखना शुरू किया तब मैंने बाबा को बताया कि बाबा मैं हूं खेलावन, कोतमा से आया हूं। तब पीर बाबा ने मुझे अपने पास बुलाया और भभूति मेरे गालों पर मल दी। मज़ार के बाहर जो अगरबत्तियां जलती हैं उनकी राख की भभूति ही बाबा का प्रसाद होता है साहब। बताईए, हैं न स्थान की महिमा!’’ मैंने उसे बताया कि सम्भव हुआ तो ज़रूर वहां जाऊंगा। मुझे वैसे भी मज़ारों में बड़ी रूचि है। इसलिए नहीं कि मुझे मज़ारों में श्रद्धा है, बल्कि इसलिए कि वहां आस्था, बाज़ार और अंधविश्वास के नए-नए रूप देखने को मिलते हैं। ये मज़ार न होते तो न होतीं इलायची दाना, रेवड़ी की दुकानें। ये मज़ार न होते तो चादरों, फूलों और तस्बीह-मालाओं का कारोबार न चलता। ये मज़ार न होते तो कैसेट, इत्र, अगरबत्तियों के उद्योगों का क्या होता? ये मज़ार न होते तो क़व्वालिये बेकार हो गए होते? ये मज़ार न होते तो श्रद्धालु इतनी गै़र-ज़रूरी यात्राएं न करते और बस-रेल में भीड़ न होती। ये मज़ार न होते तो लड़का पैदा करने की इच्छाएं दम तोड़ जातीं। ये मज़ार न होते तो जादू-टोने जैसे छुपे दुश्मनों से आदमी कैसे लड़ता? ये मज़ार न होते तो खिदमतगारों, भिखारियों, चोरों और बटमारों को अड्डा न मिलता? शायद इसीलिए मुझे मज़ारात में रूचि है। कटघोरा वाली मज़ार के बारे में जानकर लगा कि चलो देखा जाए क्योंकि कटघोरा में मेरा बचपन गुज़रा है। इसी बहाने पुरानी यादें ताज़ा हो जाएंगी। खेलावन फोरमेन ने मुझे रास्ते की बारीकियां समझाईं कि कहां तक पक्की रोड है और कितनी दूर तक कच्ची सड़क है। मैंने सभी विवरण डायरी में नोट कर लिया। मेरे अब्बू कटघोरा के हायर सेकण्डरी स्कूल में पढ़ाते थे। मैंने वहां मिडिल स्कूल तक की शिक्षा पाई थी। फिर अब्बू का तबादला खरसिया हो गया। मैंने रायपुर इंजीनियरिंग काॅलेज से मेकेनिकल इंजीनियरिंग की और कोयला खदान में इंजीनियर बन गया। प्रमोशन पाते-पाते सुपरिटेण्डेंट इंजीनियर हो गया हूं। कटघोरा में चूंकि हम सरकारी आवास में रहते थे, इसलिए वहां फिर जाना हो नहीं पाया था। अब्बू ने रिटायरमेंट के बाद रायपुर में मकान बना लिया सो कटघोरा से उनका भी कोई लिंक न रहा। ऽ अपनी कार से मैं कटघोरा के पास पहुंचा तो खेलावन फोरमैन की बात याद हो आई। मैंने सोचा कि पहले कटघोरा बस स्टेंड पहुंच कर चाय पी जाए फिर आगे की सोची जाएगी। वैसे भी बस-स्टेंड ही कटघोरा का हृदय-स्थल है। वहां की चहल-पहल से पुरानी यादें ताज़ा होंगी। बचपन में दोस्तों के साथ हम बस-स्टेंड आते थे। मैं बस-स्टेंड की किताबों की दुकान से पराग और नंदन जैसी बाल-पत्रिकाएं खरीदा करता था। सरकारी आवास भी आगे सड़क के किनारे थे। हमारा क्वार्टर सबसे किनारे था। अम्मी को बागवानी का शौक था इसलिए क्वार्टर के बगल में और पीछे नाले तक अब्बू ने तार से घेरा बनवा दिया था। स्कूल का चपरासी अम्मी की बागवानी में मदद किया करता था। अम्मी उस छोटे से किचन-गार्डन में लहसुन, हल्दी, पपीता, अमरूद और केला लगवाया करती थीं। साग, धनिया और पुदीना भी होता। गुलाब, लिली और सेवंती की क्यारियां देखने लायक हुआ करती थीं। सर्दियों के दिन थे। कटघोरा बस-स्टेंड में काफी भीड़-भाड़ थी। लोग धूप तापते हुए बस का इंतज़ार कर रहे थे। कुछ बस आ रही थीं, कुछ जा रही थीं। कोने की चाय गुमटी के पास मैंने कार रोकी और एक कड़क चाय कम चीनी की बनाने का आर्डर दिया। पता नहीं क्यों मुझे अच्छे होटलों में बैठ कर चाय पीने में मज़ा क्यों नहीं आता? मुझे इसी तरह गुमटियों में चाय पीना बहुत अच्छा लगता है। दुकानदार ने ख़ास तवज्जो दी और तत्परता से एक कड़क चाय बनाकर पेश की। चाय की चुस्कियों के बीच मैं माहौल का जायज़ा लेने लगा। बस-स्टेंड पहले से काफी भरा-पूरा हो गया है। इतनी दुकानें पहले कहां थीं? रिक्शे की जगह आॅटो ने ले ली है। कई कम्पनियों के मोबाईल टाॅवर दिखलाई पड़ रहे हैं। चाय पीकर मैंने सिगरेट सुलगाई और किताब की दुकान जा पहंुचा। वहां अब एक लड़का बैठा हुआ था। पत्रिकाओं पर एक निगाह डालते हुए मैंने पूछा-‘‘हंस है?’’ लड़का मोबाईल का ईयरफोन कान में ठूंसे कोई गीत सुन रहा था। मेरा प्रश्न सुनकर ज़ोर से बोला-‘‘नहीं, बिकता नहीं। इंडिया-टुडे ले लीजिए।’’ मैंने देखा कि वहां ‘वयस्कों के लिए’ शीर्षक लिए कई रंग-बिरंगी पत्रिकाएं प्रदर्शित थीं। एक तरफ बाबा रामदेव की किताबें और हनुमान चालीसा, गीता आदि अन्य धार्मिक किताबें थीं। मैंने सिगरेट खत्म की और कार स्टार्ट कर अपने उस क्वार्टर की तरफ कार मोड़ दी जहां मेरे बचपन के दिन गुज़रे थे। मेन रोड के किनारे हमारा आवास अब खण्डहर में तब्दील हो चुका था। लगता है कि अब सरकार ने नई जगह काॅलोनी बना ली है। आवास से लगा नाला अब दिखलाई नहीं देता। वहां कई अवैध मकानों की पौध उग आई है। तेजी से फैलते शहरीकरण का नमूना देख मेरा दिल भर आया। मैंने कार वापस बिलासपुर जाने वाली सड़क की तरफ मोड़ दी। मुझे मज़ार भी जाना था। तिगड्डे पर आकर बिलासपुर जाने वाली सड़क पर कार दौड़ रही थी। खेलावन फोरमैन ने बताया था कि तिगड्डे से लगभग एक किलोमीटर बाद बाई तरफ एक सड़क कटती है। उस पर एक किलोमीटर जाना है और वहीं मज़ार है। मैंने इत्मीनान से कार चलाते हुए मज़ार तक का सफ़र तय किया। देखा कि एक गुम्बदनुमा इमारत तैयार हो रही है। हरे रंग का गुम्बद दूर से दिखता है। दिन के बारह बज रहे थे। मज़ार के आस-पास आठ-दस दुकानें थीं, जिनमें चादर, फूल और शीरनी बेची जाती है। मैंने कार एक किनारे खड़ी की, जेब से रूमाल निकाल कर सिर पर बांध लिया और एक दुकान के सामने जा खड़ा हुआ। इस बीच कई दुकानदारों ने मुझे अपनी ओर आवाज़ देकर बुलाना चाहा। मैंने कहा-‘‘कोई एक जगह ही जा पाउंगा भाई!’’ दुकानदार एक दुबला-पतला वृद्ध था, जिसने हरे रंग का कुर्ता और सिर पर हरे रंग की टोपी पहन रखी थी। उसने मुझे सलाम किया और कहा-‘‘जूते उतार कर अंदर चले जाइए, वज़ू बना लीजिए।’’ मैंने जूते उतारे और अंदर चला गया। वहां एक कोने में नल लगा था और बैठकर वज़ू बनाने की व्यवस्था थी। वज़ू बनाकर मैंने दुकानदार से कहा-‘‘इंक्यावन रूपए की चादर और शीरनी का जुगाड़ बना दें।’’ दुकानदार ने प्लास्टिक की डलिया में एक हरे और लाल रंग की चादर रखी, इत्र, अगरबत्ती और रेवड़ी का पैकेट रखा। डलिया मैंने बड़ी श्रद्धा से सिर पर उठाई और मज़ार की तरफ चल पड़ा। कई भिखारी मेरी ओर लपके। उनसे बचते-बुचाते गुम्बदनुमा मज़ार के अंदर मैं प्रवेश कर गया। इससे पहले मैं जिस मज़ार शरीफ़ में गया तो एक आध्यात्मिक शांति का अनुभूति पाया था लेकिन उस मज़ार में मुझे ऐसा एकदम नहीं लगा कि किसी रूहानी जगह में दाखि़ल हो रहा हूं। हरा गुम्बद सिर पर सजाए वह एक बड़ा सा चैकोर कमरा था। सुनहरे रंग के बार्डर वाला एक खुशनुमा दरवाज़ा, जिसके बाहर दोनों तरफ लोग बैठे हुए थे। सुनहरे दरवाज़े पर अरबी में कलमा लिखा हुआ था। ‘लाइलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह’ मैंने बडे अदब से दरवाज़े की चैखट का एक हाथ से बोसा लिया और डलिया सम्भाले मज़ार के अंदर दाखिल हुआ। मैंने मन ही मन मज़ार को सलाम किया-‘‘अस्सलामो अलैकुम या अहले कुबूर!’’ फिर मैंने अंदर का जाएज़ा लिया। वहां मैंने देखा कि हरा चोगा पहने एक आदमी मज़ार की तरफ मुंह किए कुछ बुदबुदा रहा है। उसकी पीठ मेरी तरफ थी। शायद वह फ़ातिहा पढ़ रहा था। मैं हरे चोगे वाले आदमी के सामने जा पहुंचा और बिना उसके चेहरे की तरफ देखे डलिया बढ़ाई, ताकि पहले मज़ार शरीफ़ का बोसा ले लूं। डलिया पकड़ाकर मैंने हरे चोगे़ वाले आदमी के चेहरे की तरफ देखा, मुझे शक्ल कुछ पहचानी सी लगी। अचानक मेरे ज़ेहन में अपने साथ मिडिल तक के पढ़े कल्लू उर्फ कलीम मुहम्मद की तस्वीर उभर आई। मैंने देखा कि हरे चोगे़ वाला आदमी भी मुझे इस नज़र से देख रहा है जैसे वह अतीत के चलचित्र में कुछ खोज रहा हो। मैं मुस्कुराया। हरे चोग़े वाला आदमी का चेहरा मेरी मुस्कान देख अचानक भावहीन हो गया। उसने चुपचाप डलिया ली। यंत्रवत डलिया में से हरी चादर निकाली और चादर मज़ार पर चढ़ाने लगा। मैंने भी चादर का एक कोना पकड़ कर चादर-पोशी में हिस्सा लिया। फिर उसने डलिया में से शीरनी का पैकट निकाला, एक कोना फाड़ा और मज़ार के किनारे उसे रखा। इत्र की शीशी खोल इत्र को चादर पर छींट दिया और आंख बंद कर फ़ातिहा पढ़ने लगा। मैंने भी फ़ातिहा ख़्वानी के लिए हाथ उठा लिए। हरे चोगे़ वाला आदमी अब मुझे अच्छी तरह पहचान में आ गया। वह कल्लू ही था। मैंने चेहरे पर हाथ फेरते हुए मज़ार की परिक्रमा की और दान-पेटी में एक सौ रूपए का नोट डाला तो देखा कि हरे चोगे वाला आदमी मुझे देख रहा है। मैंने मज़ार की क़दमबोसी की और हरे चोगे वाले के पास पहुंचा। उसने मोरपंख के झाड़ू मेरी पीठ पर फेरी और मेरे कान के पास मुंह लाकर बुदबुदाया-‘‘जाइएगा नहीं, कुछ बात करनी है।’’ मैंने हामी भरी और शीरनी लेकर मज़ार से बाहर निकल आया। तब तक जाने कहां से कुछ क़व्वाल आ गए थे। मैे क़व्वालों के पास बैठ गया और क़व्वाली का लुत्फ़ उठाने लगा। ‘भर दे झोली मेरी या मुहम्मद लौट कर मैं न जाउंगा ख़ाली’ मैं क़व्वाली के बोल सुनते हुए हरे चोगे वाले मुजाबर यानी कल्लू उर्फ कलीम मोहम्मद वल्द मोहम्मद सलीम आतिशबाज़ की याद में खो गया। ऽ इतवार का दिन था। सुबह के आठ बजे होंगे। तालाब सुनसान ही था। गांव के लोग और पशुओं के आने का अभी समय नहीं हुआ था। बारह वर्षीय नन्हा कल्लू निडर होकर उकड़ू बैठा खुरपी से मिट्टी खोद रहा था। वह काम के धुन में मगन था। वहीं छपाक् छपाक् मेंढक पानी और किनारे वाला कोई खेल खेलने में मशगूल थे, रहें अपनी बला से, नन्हे कल्लू की तन्द्रा इन छपाक् से भंग होने वाली नहीं है। उसने उस मिट्टी का ठिकाना जान लिया है जिससे वह कैसे भी आकार बना सकता था। जब कल्लू नन्हा सा बच्चा था तब वह अपनी अम्मी को रसोई में परेशान किया करता था। वह ज़माना गैस का नहीं था। लकड़ी से जलने वाला मिट्टी का दोमुंहा चूल्हा जलता और उसकी लाल आंच में खाना पकाती अम्मी की आकृति कल्लू को किसी परी सी लगती थी। लकड़ी की धीमी आंच में दाल पकती और रोटियां सिंकतीं। कल्लू दोनों तरफ कड़क सिंकी रोटी खाया करता था। तीन बहनों के बाद उसकी आमद हुई थी सो कल्लू का घर में बड़ा मान था। बहनें भी उसे प्यार किया करती थीं। अम्मी आटा गूंधना शुरू करतीं कि कल्लू उनके पास जा पहुंचता और बोलता-‘लोई से चिड़िया बना दो न अम्मी!’ या कि ‘चूहा बना दो न अम्मी!’ अम्मी बच्चे की ज़िद को पूरा करती और थोड़े सा आटा लेकर कल्लू के लिए चिड़िया या चूहा बना देती। उसके बाद कल्लू उस आटे के खिलौने से खेलता। कुछ देर बाद कल्लू आटे के खिलौनों को पुनः लोंदे की शक्ल दे देता और अपनी कल्पना-शक्ति से आम, केला या आदमी का मुंह बनाता। धीरे-धीरे वह हाथी बनाना सीख गया। हाथी बनाकर वह उसे चूल्हे के अंगार में पकाता और फिर स्याही से रंग कर देता। फिर दोस्तों को दिखाता-‘‘देखो देखो, नीला हाथी!’’ वह जब भी अपने ननिहाल जाता तो नानी के घर के पास रहने वाले कुम्हारों के काम को घण्टों निहारा करता था। वह कुम्हार को मिट्टी बनाने की तैयारी करते देखता। वाकई बेदाग मुलायम चिकनी मिट्टी को घड़ा आदि बनाने के लिए तैयार करना काफी श्रमसाध्य कार्य था। जब गूंथी हुई मिट्टी का लोंदा घूमते चाक पर चढ़ता और कुम्हार के जादुई स्पर्श से घड़े की शक्ल में, या सुराही में बदलता तो नन्हा कल्लू अचंभित खड़ा देखता रहता। उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहता। वह थोड़ा बड़ा हुआ तो काली मंदिर के पास बसे बंगाली कलाकारों के पास जाने लगा। वहां गणेश भगवान, दुर्गा मां, काली मां, सरस्वती, राक्षस और शेर आदि की मूर्तियां बनते देखा करता। किस तरह कलाकार खपच्चियों का ढांचा खड़ा करते हैं। फिर पुआल और सुतली की सहायता से विभिन्न आकार बनाते हैं कि ऐसा आभाष होता जैसे आदमी या जानवरों के कंकाल खड़े हों। कंकाल में मिट्टी का लेप चढ़ता तो बिना सिर की मूर्तियां बन जातीं। स्त्री शरीर, पुरूष शरीर और जानवरों के बिना सिर के जिस्म। कलाकारों के पास मुंह के अलग-अलग सांचे हुआ करते। किसी सांचे में देवी दुर्गा का मुंह बन जाता, किसी सांचे से भगवान राम की मुखाकृति। किसी सांचे से गणेश भगवान का चेहरा बनता और किसी सांचे से राक्षस के भयानक मुंह। शेर, मोर, चूहा, सांड के मुंह के सांचे भी यथावसर उपयोग किए जाते। कल्लू के इस मूर्ति प्रेम ने उसके जीवन में हलचल मचाई थी। वह बहुत बाद की बात है। ऽ पाठशाला में हस्तशिल्प की परीक्षा के समय मिट्टी के खिलौने बना कर जमा करना होता था। कल्लू के खिलौने सभी खिलौनों से अलग होते। वह मिट्टी से सीताफल ऐसा बनाता कि असल का भ्रम होता। हां, उसके पास रंग न होते और वह स्याही से उसे रंगता। हरा की जगह नीला सीताफल। शिक्षक उसे हस्तशिल्प में पूरे नम्बर दिया करते। मिट्टी के केले बनाता तो उसमें पिसी हल्दी घोलकर रंग भरता। फिर कहता कि ये पके केले हैं। कल्लू स्कूल में होने वाले गणेशोत्सव के लिए इस बार स्वयं गणपति की मूर्ति बनाने के लिए परेशान था। स्कूल के तिवारी मास्साब उसे प्रोत्साहित कर रहे थे कि इस बार मूर्ति वही बनाए। बारह वर्षीय कल्लू उर्फ कलीम मोहम्मद आत्मज मोहम्मद सलीम आतिशबाज ने बड़ी लगन से गणपति बप्पा की दो बित्ते की मूर्ति बनाई। इसीलिए कल्लू सुबह-सुबह तालाब के किनारे बैठा मिट्टी इकट्ठा कर रहा था। वह मिट्टी स्कूल ले जाता। वहां ग्राउण्ड के किनारे प्राचार्य के आॅफिस के पीछे उसने अपना कार्यशाला बनाई थी। कल्लू ने सोचा कि दो दिन के अंदर मूर्ति तैयार करेगा। तिवारी मास्साब ने कल्लू की मदद के लिए शंकर चपरासी के लगाया था। शंकर ने कल्लू के लिए खच्चियां, पुआल और सुतली की व्यवस्था कर दी थी। हां, गणपति बप्पा के मुंह के लिए सांचा तो था नहीं। नन्हे कल्लू ने बिना सांचे के गणेश भगवान का चेहरा बनाने का निर्णय लिया था। शंकर ने एक कैलेण्डर ला दिया था जिसमें गणपति की मनमोहक मुद्रा थी। कल्लू ने बड़ी तन्मयता से मूर्ति निर्माण का कार्य अंजाम दिया। शंकर के कहने पर कल्लू प्रतिदिन नहा कर आता ताकि मूर्ति निर्माण में पवित्रता बरकरार रहे। उसने खपच्चियों का ढांचा खड़ा किया। फिर पुआल और सुतली की सहायता से गणेश जी का आकार बनाया। धीरे-धीरे उसने पुआल पर मिट्टी चढ़ाई और बिना सांचे की सहायता से गणेश भगवान की ऐसी प्रतिमा बनाई की देखने वाले देखते रह जाएं। तिवारी मास्साब बोलते-‘अद्भुत प्रतिभा है बालक में। मां सरस्वती का वरदान मिला है इसे। देखो तो कितनी जीवन्त प्रतिमा बना दी है इसने।’ वाकई हम बच्चों को बड़ा अजीब लगता कि कैसे हमारा एक हमउम्र इतनी सफाई और लगन से मूर्ति निर्माण के कार्य को अंजाम दे रहा है। तिवारी मास्साब ने शंकर से कल्लू के लिए रंगों की पुड़िया मंगवा दी। मूर्ति सूखी तो कल्लू ने रंग का लेप चढ़ाया। तिवारी मास्साब ने मूर्ति का श्रृंगार-आभूषण आदि मंगा दिया, कैलेण्डर को देख-देख कल्लू ने गणेश भगवान की मूर्ति का ऐसा श्रृंगार किया कि जो देखे दंग रह जाए। उसने मूर्ति के पास रखने के लिए एक छोटा सा चूहा भी बनाया, गणपति बप्पा की सवारी मूषक। फिर एक तख्ती पर उसने बड़ी स्टाईल से लिखा- वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभा निर्विध्नं कुरूमे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा तिवारी मास्साब ने विद्यालय में उसी मूर्ति की स्थापना की और पूजन किया। यह बात उड़ते-उड़ते मुसलमानों की बस्ती में भी पहुंची। हम बच्चों को तो ख़ास मतलब न था, लेकिन सुनते हैं कि कल्लू के इस मूर्ति निर्माण ने उसके जीवन में कई तब्दीलियां लाईं। कल्लू के अब्बू मोहम्मद सलीम आतिशबाज की जमकर मज़म्मत की गई। उनसे कहा गया कि कल्लू को मस्जिद लाकर उससे सामूहिक रूप से माफी मंगवाई जाए और तौबा करवाई जाए। सलीम आतिशबाज बड़े अकड़ू किस्म के इंसान थे। थे भी पूरे सवा छः फुट के क़द के आदमी। कहते थे कि हिन्दुस्तानी मुसलमान तो हैं नहीं, उनके पूर्वज इराक से आए थे। वह स्वयं को इराकी कहा करते थे और नगर के मुसलमानों को नीची नज़र से देखते थे। कहते थे कि हुज़ूर ने कहा है कि हक़-हलाल की कमाई खाओ, मैं मेहनत करता हूं। आतिशबाजी का हुनर मुझे मेरे पूर्वजों से मिला है, इसलिए इसमें लोगों को एतराज़ क्यों होता है? मैं कोई ब्याज के पैसे खाता नहीं, हरामकारी करता नहीं फिर मुझसे लोग चिढ़ते क्यों हैं? बेटे कल्लू के कारण हुई इस फजीहत से वह बेहद दुखी रहने लगे थे। उन्होंने कह दिया था कि उन्हें चाहे समाज से हटा दिया जाए, लेकिन बच्चे से वह माफी मंगवाने का काम नहीं करेंगे। कल्लू के अब्बू ने कल्लू की पिटाई की और उससे कहा कि वह भगवान या देवी-देवता की मूर्ति बनाना छोड़ दे। कल्लू मार खाता रहा और मन ही मन प्रण करता रहा कि वह मूर्ति बनाने का शौक पूरा करता रहेगा। इस मूर्तिकला के हुनर के कारण ही तो उसकी स्कूल में इज्जत है, शोहरत है और इसी से गुरूजन खुश रहते हैं। मैंने देखा था कि उस घटना के बाद से कल्लू उदास रहने लगा था। कल्लू के परिवार का सुन्नी मुस्लिम कमेटी ने बहिस्कार कर दिया। अब उन्हें कोई अपने दुख-सुख में बुलाता न था। इसी दरमियान कल्लू के अब्बू मृत्यु हो गई। कल्लू यतीम हो गया। कल्लू की अम्मी ने सुन्नी मुस्लिम कमेटी के सदर, सेक्रेटरी और अन्य पदाधिकारियों के आगे दुखड़ा रोया तब कहीं जाकर कमेटी ने निर्णय लिया कि चूंकि मरहूम मोहम्मद सलीम आतिशबाज कलमागो मुसलमान था, जुमा और ईद-बकरीद की नमाज़ अदा करता था, मस्जिद के लिए जो भी चंदा मुकर्रर किया जाता, वह अदा किया करता था, इसलिए उसके कफ़न-दफ़न और जनाजे की नमाज़ में कमेटी को शामिल होना चाहिए। और इस तरह मरहूम आतिशबाज मोहम्मद सलीम की मैयत में लोग इकट्ठा हुए और कफ़़न-दफ़न हुआ। कुरआन-ख़्वानी हुई। दसवां-चहल्लुम की फ़ातेहा हुई। गरीबी की मार से कल्लू पढ़ाई छूट गई। कल्लू की अम्मी चूंकि आतिशबाजी के काम में हाथ बंटाती थी,सो उसने कल्लू से कहा कि अब्बू का धंधा जिन्दा रखा जाए। कल्लू को तो मूर्तिकला से लगाव था। उसने बेमन से आतिशबाजी के काम को ज़ारी रखा और साथ ही मूर्तिकला के हुनर में जी जान से जुट गया। हम कभी बिलासपुर जाने वाली सड़क की तरफ जाते तो बंगाली मूर्तिकारों के यहां कल्लू को काम करता पाते। फिर मेरे अब्बू का कटघोरा से स्थानान्तरण हो गया और उस जगह से हमारा सम्पर्क खतम हो गया। ऽ क़व्वाल गा रहे थे- ‘ज़माने मे कहां टूटी हुई तस्वीर बनती है तेरे दरबार में बिगड़ी हुई तक़दीर बनती है’ सुनने वाले दस-बीस रूपए के नोट क़व्वाल की हारमोनियम पर रखते जाते। क़व्वाल हाथ के इशारे से उन्हें आदाब कहता और फिर रूपए की तरफ देखते हुए तान खींचता। तभी मैंने देखा कि कल्लू उर्फ कलीम हरा चोगे में मज़ार से बाहर आया। उसने मुझे इशारा किया और मैं उठ कर उसके पीछे हो लिया। हम मज़ार के पीछे की तरफ आए। यहां एक तरफ बड़े से चूल्हे में लंगर बन रहा था। चूल्हे की आंच से बचते हम एक कोठरी में घुसे। यहां ज़मीन पर सफेद गद्दा बिछा था और गाव-तकिए करीने से रखे हुए थे। कल्लू बैठ गया और मुझे बैठने का इशारा किया। मैं उसके नज़दीक बैठ गया। मैंने मुस्कुराकर उससे पूछा-‘‘ये कैसा रूप ले लिया भाई?’’ कल्लू के माथे पर चिंता की लकीरें थीं-‘‘क्या करता। इन कठमुल्लों को सबक़ सिखाने का इसके अलावा मेरे पास कोई रास्ता नहीं था।’’ ‘‘कैसे?’’ मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी। ‘‘अब्बू की मौत के बाद अम्मी भी ज्यादा दिन जिन्दा नहीं रहीं। उनकी मौत पर फिर एक बार कमेटी वालों ने नौटंकी की। मेरे गिड़गिड़ाने पर वे कफ़न-दफ़न को राज़ी हुए।’’ ‘‘तुमने मूर्ति बनाने का काम क्या तब भी ज़ारी रखा?’’ ‘‘हां, बंगाली आर्टिस्टों के साथ मैंने खूब काम किया। बंगाली की बेटी से मुझे मुहब्बत हो गई। बंगाली उससे मेरी शादी के लिए तैयार हो गया। उसने अपनी बेटी के धर्म बदलने के मामले में भी सहमति दे दी। मैं कमेटी वालों के पास गया कि मेरा निकाह हो जाए, कमेटी वालों ने मेरी कोई मदद न की। वे मुझे ‘काफ़िर’ कहने लगे।’’ कल्लू की आंखें भर आई थीं। मैं चुपचाप उसकी जीवन-गाथा सुन रहा था। आंखें पोंछ कर उसने बताया-‘‘मैंने अल्लाह और रसूल को हाज़िर-नाज़िर मानकर अपना निकाह खुद किया। मैंने अपनी बीवी का नाम सायरा रखा। पहले उसका नाम श्रेया था।’’ उसने मुंह पीछे की तरफ करके आवाज़ दी-‘‘सायरा!’’ चंद लम्हे बाद सलवार-सूट में एक औरत ने परदे के पीछे से झलक दिखलाई। वह एक सांवले चेहरे और बड़ी-बड़ी आंखों वाली स्त्री थी। मैंने कल्लू के पसंद की मन ही मन तारीफ़ की। कल्लू ने स्त्री से कहा-‘‘मेरे बचपन के दोस्त हैं ये!’’ सायरा ने सलाम किया। मैंने जवाब दिया-‘‘वा अलैकुम अस्सलमाम!’’ कल्लू ने कहा-‘‘चाय तो पिलाईए इन्हें!’’ सायरा चली गई और कल्लू ने अपने बयान को अंजाम तक पहुंचाया-‘‘मैं शादी के बाद घूमने निकल गया। मैंने कई मज़ारों की सैर की। सभी जगह मैंने पाया कि वहां इस्लाम की रौशनी नदारत थी। था सिर्फ और सिर्फ अक़ीदतमंदों की भावनाओं से खेल कर पैसे कमाना। मैं तो सिर्फ मूर्ति बनाया करता था। उसे पूजता तो न था। लेकिन इन जगहों पर मैंने देखा कि एक तरह से मूर्तिपूजा ही तो हो रही है। तभी मेरे दिमाग में ये विचार आया कि मैं भी पाखण्ड करके देखता हूं। लौट कर जब कटघोरा आया तो मैंने नगर के बाहर इस स्थान पर बैठना शुरू किया। हरा चोगा धारण कर लिया। भंगियों का मुहल्ला लगा हुआ है। वहां की औरतें मेरे पास आने लगीं और बच्चों की नज़र उतरवाने लगीं। मैं कुछ नहीं करता। बस अगरबत्ती की राख उन बच्चों के गाल पर लगा देता। उन्हें यक़ीन हो जाता और मज़े की बात ये है कि बच्चे ठीक भी हो जाते। उन्हीं लोगों ने चंदा इकट्ठा करके मेरे लिए एक कोठरी बना दी। सायरा मेरे पास आकर रहने लगी। फिर मैंने जुमा की एक शाम घोषणा कर दी कि मुझे रात ख़्वाब में पीर बाबा आए और बताया कि बच्चा इसी जगह मेरी मज़ार बनाओ। मेरी बात जंगल में आग की तरह फैली और सुन्नी कमेटी वालों ने आनन-फानन चंदा इकट्ठा करना शुरू कर दिया।’’ मैं जहां बैठता था उसी से लगी थी कमेटी के सदर की ज़मीन। उन्होंने सोचा कि मज़ार बनने से उनकी ज़मीन का रेट बढ़ेगा और उनका रोज़गार भी फैलेगा। हुआ वही। जो कमेटी मेरी दुश्मन थी, उसने मुझे मज़ार का मुजाबर बना दिया।’’ मुझे हंसी आ गई-‘‘और ये हिन्दू अहीर वाली बात!’’ कल्लू मुस्कुराया-‘‘बेरोजगार था अहीर, मेरे पास आकर बैठता। गांजा पीता। फिर कभी कभी झूमने लगता। मैंने कहा कि इस पर पीर बाबा की सवारी आती है। उसका भी रोजगार चल निकला। इस तरह यहां अब हिन्दू और मुसलमान दोनों आकर मन्नतें मांगते हैं और हमारी रोजी-रोटी चलती है।’’ सम्पर्क: टाईप 4/3, बिजुरी, अनूपपुर मप्र 484440 09907978108 sanketpatrika@gmail.com